काव्य :
जीना
सम्मान में खड़े होना
होता है शिष्टाचार ,
ईश्वर के आगे झुकना
है भक्ति का इज़हार।
भीड़ में खड़े हो अच्छा है
जय जय कार करना,
भीड़ का हिस्सा होना
नहीं श्रद्धा व्यक्त करना।
संत साधु महात्मा सेवक
भीड़ सबको चाहिए,
अपने सामने नतमस्तक
प्रश्न नहीं याचना चाहिए।
एक ऊपर विराजमान
सैकड़ों नीचे, कौन सी रीत
एक चेहरे पर दंभी मुस्कान
सैकड़ों पर एक दबी भीत।
एक पानी एक ही पवन
एक ही धरती एक आसमान ,
एक मानव एक ही जीवन
फिर पाना क्यों है असमान।
एक जीता शान से यहाँ
एक मांगता मौत यहाँ,
ऐसा क्यों है जगत में
कौन समझाएगा यहाँ।
- डॉ. सत्येंद्र सिंह
पुणे, महाराष्ट्र
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अद्भुत, गूढ़ मनुष्य जीवन। हार्दिक बधाई🎉🎊
ReplyDeleteलतिका