ईर्ष्या नहीं, अपने भावों और विचारों को शुद्ध रखें : भावनामति
इटारसी। अपने भावों को शुद्ध रखें और विचारों को निर्मल बनाएं। मन का प्रदूषण ध्वनि, वायु और जल के प्रदूषण से भी अधिक खतरनाक है। इसलिए किसी से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए। हमें जो मिला है, वह हमारे भाग्य का फल है और दूसरे को जो मिला है, वह उसके भाग्य का। जब सभी को अपने-अपने भाग्य के अनुसार मिलता है तो फिर ईर्ष्या किस बात की?
यह विचार महावीर भवन, इटारसी में आर्यिका संघ प्रमुख भावनामति माताजी ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि ईर्ष्या मनुष्य के भीतर अशांति पैदा करती है और उसे अपने लक्ष्य से भटका देती है।
उन्होंने कहा, “ईर्ष्या करनी ही है तो पड़ोसी से नहीं, ईश्वर से करो।” ऐसी ईर्ष्या करो कि जीवन में इतना ऊपर उठने का प्रयास करो कि दुनिया तुम्हें देखकर प्रेरणा ले। जीवन को सहजता से जीना चाहिए। सुख-दुःख में जो भी मिले, उसे स्वीकार करते चलना चाहिए। क्या पता, जिस दुःख को हम आज दुःख समझ रहे हैं, वही उस सुख का द्वार हो, जो उसके पार हमारा इंतजार कर रहा हो।
भावनामति माताजी ने कहा कि संसार में परिस्थितियां केवल निमित्त मात्र हैं, जबकि वास्तविक उपादान हमारे भीतर ही है। इसलिए यदि जीवन में कभी कुछ हमारी इच्छा के विपरीत हो जाए तो यह सोचकर स्वीकार करें कि “होना था, तो हो गया; कोई बात नहीं।” अपने चिंतन और सोच को बदलने से परिस्थितियों को देखने का नजरिया बदल जाता है और जीवन भी बदलने लगता है।
उन्होंने जीवन का एक महत्वपूर्ण मंत्र बताते हुए कहा कि इसे हमेशा याद रखना चाहिए— “जो तुम्हारा है, वह कभी जा नहीं सकता और जो चला गया, वह तुम्हारा था ही नहीं।” उन्होंने कहा कि यदि व्यापार या व्यवसाय में कभी नुकसान हो जाए तो निराश होने के बजाय यह विचार करें कि जो जाना था, वह चला गया। सकारात्मक चिंतन के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने कहा कि दुनिया में रहते हुए यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि एक दिन सब कुछ छोड़कर जाना है। मनुष्य की इच्छाओं और वासनाओं की पूर्ति कठिन है। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा जागृत हो जाती है और इसी क्रम में मनुष्य संसार के मोह-माया के दलदल में फंसता चला जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य अपनी इच्छाओं पर संयम रखे और आत्मचिंतन करते हुए जीवन को सार्थक बनाए।
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