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काव्य : साहित्यकार का कर्तव्य -डॉ. विजयता दुबे कोलकाता


काव्य : 

साहित्यकार का कर्तव्य

कलम उठे तो क्रांति लिखे,
 शब्द बने अंगार
 सोए हुए समाज को जगाए,
 ऐसा हो साहित्यकार
सच की राह कठिन हो चाहे,
 पग-पग मिले प्रहार,
 झूठ के आगे शीश न झुकाए,
 ऐसा हो साहित्यकार
जिसकी आँखों में आँसू हैं,
 उनका दर्द लिखे,
 जिसके होंठ सिले हुए हैं,
 उनकी आवाज़ लिखे।
 शोषित, पीड़ित, वंचित जन का
 बन जाए अधिकार—
 जन-जन की धड़कन बनकर बोले,
 ऐसा हो साहित्यकार
अन्यायों की नींव हिला दे,
 शब्दों की हुंकार
 अंधकार के बीच जला दे,
 चेतना का अंगार
 कलम न बिके किसी प्रलोभन में,
 न हो कभी लाचार—
 सत्य-धर्म की ध्वजा उठाए,
 ऐसा हो साहित्यकार
नफरत की आँधी जब आए,
 प्रेम का दीप जलाए,
 टूटे मन में आशा भरकर,
 मानवता को जगाए।
 जाति-धर्म के भेद मिटाकर
 जोड़े हर परिवार—
 एकता का गीत सुनाए,
 ऐसा हो साहित्यकार
इतिहास से जो सीख दिलाए,
 भविष्य का निर्माण करे,
 राष्ट्र-चेतना की ज्वाला से
 हर हृदय प्रज्वलित करे।
 युवा हृदय में स्वप्न जगाए,
 दे साहस अपार—
 मातृभूमि के मान-सम्मान का
 रक्षक हो साहित्यकार

कलम समय की धार
 कलम बने जन-जागरण का
 सबसे प्रखर हथियार।
 जब तक अन्याय है जग में,
 जब तक है अत्याचार—
 तब तक निर्भय लिखता जाए,
 सच्चा हो साहित्यकार
शब्द नहीं केवल शब्द रहें,
 बन जाएँ हुँकार—
 युग को दिशा दिखलाने वाला
हो सच्चा साहित्यकार I 

- डॉ. विजयता दुबे 
कोलकाता 
पश्चिम बंगाल
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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