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लघु कथा : हर बार समझाना ज़रूरी नहीं होता - डॉ रीटा अरोड़ा , करनाल


लघु कथा : 

हर बार समझाना ज़रूरी नहीं होता

“तुम फिर देर से आए?” माँ ने दरवाज़ा खोलते ही पूछा।

राहुल ने जूते उतारते हुए कहा, “हाँ… रास्ते में एक आदमी की गाड़ी खराब हो गई थी।”

“तुम्हें हर किसी की मदद करने की क्या जरूरत है? अपनी ज़िंदगी भी देख लिया करो।”

राहुल चुप रहा। उसने बस इतना कहा, “ठीक है माँ।”

अगले दिन भी वह देर से घर पहुँचा।

“आज किसकी मदद करने रुक गए थे?” माँ ने तंज किया।

राहुल ने मुस्कुराकर कहा, “आज किसी की नहीं।”

माँ ने बात वहीं छोड़ दी।

कुछ दिनों बाद माँ बाजार से लौट रही थीं। अचानक उनका पैर फिसला और सामान सड़क पर बिखर गया। वह उठने की कोशिश कर ही रही थीं कि पास खड़े एक युवक ने दौड़कर उन्हें संभाला।

“आंटी, चोट तो नहीं लगी?”

उसने सामान उठाया और उन्हें घर तक छोड़ आया।

दरवाज़ा खुला तो राहुल सामने था।

“माँ, क्या हुआ?”

माँ ने सब बताया।

राहुल कुछ पल चुप रहा, फिर बोला,
“अच्छा हुआ कोई रुक गया।”

माँ ने उसकी ओर देखा।

“हाँ,” उन्होंने धीरे से कहा, “कभी-कभी किसी के रुकने की वजह हमें बहुत देर बाद समझ आती है।”

राहुल मुस्कुराया।

माँ भी मुस्कुरा दीं।

उस दिन के बाद राहुल देर से घर आता तो माँ घड़ी नहीं देखती थीं… *बस दरवाज़ा खुलने का इंतज़ार करती थीं।*

  - डॉ रीटा अरोड़ा , करनाल

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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