काव्य :
फिर नया सबेरा होगा
गुमनाम अंधेरो मे भी ,
क्या जीना यारो
चलो नई सुबह से
दोस्ती करले
सुनो हवाये क्या कहती है,
पास आकर
पक्षी चहचहाते है,
डाल-डाल जाकर
नदी देती है,अपने पास
आने का आमंत्रण
मन खुश हो जाता है,
जल का संगीत,पाकर
सुबह पर्वत पर फैलती है,
सुनहरी लालिमा
प्रफुल्लित हो जाये मन
भूल जाओ रात की कालिमा -
नये फूलों से गुलजार हो,
हरित वसुन्धरा
बिखर जाऐ महक ,फिजां मे
मन हो जाऐ हरा भरा
यहीं भागती जिंदगी का,
ख़ुशनुमा पल होगा
और रात की कालिमा हटकर
इक नया सबेरा होगा !!
- देवेन्द्र थापक , भोपाल
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