काव्य :
हम तुम
तुम और मैं मिले, तो "हम" बन गए,
एक-दूसरे की पूरी दुनिया हम बन गए।
हाथ थामकर हर मोड़ पर साथ निभाया,
हर मुश्किल परिस्थिति को प्यार से सुलझाया।
पापा की लाडली, मम्मी की जान थी,
भैया की आँखों का प्यारा सा मान थी।
जहाँ सिर्फ़ प्यार की भाषा ही बोली जाती थी,
जहाँ तेज़ आवाज़ कभी कानों ने सुनी न थी।
बचपन में भी जब कोई ज़रा तेज़ बोल जाता,
तो नन्हा सा दिल पल में रूठ जाता।
आँखों में नमी ले बस यही सवाल आता—
"मेरा कसूर क्या था, मेरी गलती क्या थी?"
आज भी वही मासूम बच्ची दिल में रहती है,
जो सिर्फ़ प्यार और सम्मान की भाषा समझती है।
ज़माना कितना भी बदल जाए मगर,
मैं आज भी वैसी ही हूँ, जैसी कल थी।
- प्राची शर्मा , भोपाल
Tags:
काव्य
