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लघु कथा : किसका इंतज़ार? - डॉ रीटा अरोड़ा , करनाल


लघु कथा : 

किसका इंतज़ार?

“बहू, पंडित जी के लिए भोजन अलग निकाल देना। आज तुम्हारे ससुर जी का श्राद्ध है।” सास ने रसोई में झाँकते हुए कहा।

“जी माँजी, सब तैयार है।”

“और हाँ, उनकी पसंद की खीर भी बना लेना।”

बहू ने चम्मच चलाते हुए पूछा, “माँजी, बाबूजी को खीर इतनी पसंद थी?”

“बहुत। हर त्योहार पर कहते थे, सब साथ बैठकर खाएँगे। मगर बेटों को फुर्सत कहाँ थी!”

“आपको बुरा लगता था?”

सास हँसी, लेकिन आँखें भर आईं। “बुरा किससे कहती? वे कहते थे, बच्चे अपने काम में व्यस्त हैं।”

तभी बड़ा बेटा कमरे में आया।

“माँ, पंडित जी आ गए क्या? मुझे मीटिंग के लिए निकलना है।”

सास ने उसकी ओर देखा। “बेटा, आज तो कुछ देर बैठ जा।”

“माँ, ऑनलाइन मीटिंग है। अगले साल पूरा दिन आपके साथ रहूँगा।”

बहू ने धीरे से कहा, “माँजी, खीर तैयार है।”

सास ने कटोरी में खीर निकाली और पति की तस्वीर के सामने रख दी।

बेटा दरवाज़े तक पहुँच चुका था।

“सुन बेटा!” माँ की आवाज़ सुनकर वह रुका।

“तेरे पिता भी हर बार कहते थे-अगली बार बच्चों के साथ बैठकर खाऊँगा।”

बेटे के कदम ठहर गए।

मेज़ पर खीर ठंडी हो रही थी। माँ की आँखें दरवाज़े पर थीं।

इस बार श्राद्ध पर किसका इंतज़ार बाकी था-पिता का, जो जा चुके थे, या माँ का, जो अभी भी घर में थीं?

 - डॉ रीटा अरोड़ा , करनाल
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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