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लघु कथा : ज़िंदगी जीने का हुनर - डॉ रीटा अरोड़ा , करनाल



लघु कथा : 

ज़िंदगी जीने का हुनर

“माँ, ज़िंदगी को आखिर जीना कैसे चाहिए?” रिया ने पूछा।

माँ मुस्कुराई, “जैसे चाय पीते हैं।”

“मतलब?”

“कभी मीठी, कभी फीकी… फिर भी हर घूँट का अपना स्वाद होता है।”

रिया बोली, “लेकिन माँ, जब अपने ही दुख देने लगें, सपने टूट जाएँ और मन की बातें सुनने वाला कोई न हो, तब?”

माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “तब ज़िंदगी को दूसरों के व्यवहार की शर्तों पर जीना छोड़ देना चाहिए।”

“तो क्या अपनों से उम्मीदें रखना गलत है?”

“नहीं बेटा, लेकिन अपनी सारी खुशियों की चाबी दूसरों के हाथ में दे देना ठीक नहीं। रिश्ते निभाओ, पर खुद से रिश्ता मत तोड़ो। दूसरों को समझो, मगर अपनी भावनाओं को हर बार झुठलाकर नहीं।”

रिया कुछ देर चुप रही।

“और अगर कोई हमारी खामोशी को हमारी कमजोरी समझे?”

माँ खिड़की से बाहर देखते हुए बोली, “तो हर बार सफाई देना ज़रूरी नहीं। कभी-कभी अपने मन की शांति बचाकर आगे बढ़ जाना भी ज़िंदगी जीने का हुनर है।”

रिया ने पूछा, “और खुश कैसे रहें?”

माँ मुस्कुराई, “यह तुम तय करो कि तुम्हें अपनी बची हुई ज़िंदगी शिकायतों में बितानी है या उन छोटी-छोटी खुशियों में, जो अब भी तुम्हारा इंतज़ार कर रही हैं…”

रिया ने माँ का हाथ थाम लिया, लेकिन उसके मन में एक सवाल अब भी बाकी था-क्या अपने लिए जीना सीख लेना, अपनों से दूर हो जाना है?

 - डॉ रीटा अरोड़ा , करनाल
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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