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संविधान औरआम जनता के गिले _ शिकवे - बलवंत सिंह ठाकुर एडवोकेट नर्मदापुरम



संविधान औरआम जनता के गिले _ शिकवे
   
      भारत का एक सामान्य नागरिक होने के नाते हम जानते हैं कि भारत का संविधान सरकार के किसी फैसले के खिलाफ या अपनी मांगों को लेकर आम जनता को धरना प्रदर्शन करने का अधिकार देता है क्यों कि लोकतंत्र में जनता ही मालिक है और जब सरकार किसी व्यक्ति व समूह की अपेक्षाओं को पूरा नहीं करती हो तो ऐसा करना असंवैधानिक नहीं है। 
 लेकिन कुछ सवाल सुप्रीम कोर्ट के माननीय चीफ जस्टिस और भारत सरकार से करना चाहते हैं कि आंदोलन के बीच में या आंदोलन करते हुए........ 

1.     क्या धरना प्रदर्शन के बीच में आम जनता को असंवैधानिक काम करने की छूट देता है????

2.    क्या सरकारी और निजी संपत्तियों को आग के हवाले करने का छूट देता है???

3.    क्या किसी गरीब या सामान्य व्यक्ति से मारपीट करने की अनुमति देता है????

4.    क्या व्यवसायिक संस्थानों एवं गरीबों के ठेले एवं रेहडी पटरी पर जिविका चलाने वाले व्यापारियों को तोड़ फोड़ करने लूटपाट करने की अनुमति देता है???

5.     देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री और राज्यपाल जैसे संवैधानिक महत्व के पदों पर नियुक्त व्यक्ति को भद्दी भद्दी गालियां, अपमान जनक व्यंग्य उपहास, साथ ही उनके माता पिता व परिजनों को गंदी गंदी गालियां देने की अनुमति देता है????

6.     देश विरोधी नारा लगाने, दुश्मन देशों का झंडा लहराने/ फहराने और भारत को टुकड़े टुकड़े करने का नारा लगाने की अनुमति देता है??? 

7.     यदि हाँ तो बताएं कि उसका संविधान में विवरण कहाँ है??? 

8.     यदि नहीं तो ऐसे घिनौनेअपराध करने वाले असमाजिक तत्वों को राष्ट्रविरोधी तत्वों को, धरना प्रदर्शन के बाद केंद्र व राज्य सरकारें उन्हें किस आधार पर FIR अर्थात पंजीकृत मामले में भी क्षमा कर देती है??? 

9.     मान्यवर क्या पुलिस सेवा में सत्यनिष्ठा से जूड़े पुलिसकर्मी के साथ धरना प्रदर्शनों में जब अभद्रता की जाती है, उनके साथ मारपीट करते हुए बुरी तरह से चोटील व घायल कर दिया जाता है यहां तक कि उनकी हत्या कर दी जाती है फिर भी सरकार द्वारा आंदोलनकारियों को माफ कर दिया जाना क्या संवैधानिक है??? क्या ऐसे में पुलिसकर्मियों के साथ संविधान न्याय / उचित व्यवहार करता है??? 

10.    महोदय, यह लोकतंत्र है इसमें धरना प्रदर्शन / आंदोलन होना असामान्य नहीं है लेकिन इन विषम परिस्थितियों में पुलिसकर्मी क्या सत्यनिष्ठा के साथ देश व समाज की सेवा कर सकती है ??? साथ में यदि उसे सरकार या वरिष्ठ पदाधिकारियों द्वारा ऐसा करने के लिए विवश किया जाता है तो उसके साथ ऐसा करने का संविधान अनुमति देता है??? 

यदि ऊपरोक्त सभी विपरित परिस्थितियों में भी संविधान ऐसा करने की अनुमति देता है
तो हम यही मानते हैं कि हमारा संविधान मात्र केवल कागज़ का टुकड़ा है। क्यों कि जिस संविधान को हमारे संविधान निर्माताओं ने प्राणार्पित किया था उस संविधान में न प्राण है न आत्मा, न न्याय है न दूरदृष्टि, न सिद्धांत है न उसकी व्याख्या करने की क्षमता । क्यों कि यह पुस्तक हमारे अधिकारों की रक्षा करने में पूर्ण रूप से असफल है। यह संविधान न तो आम जनता के हितों की रक्षा करता है, न तो सरकारी सेवा में सत्यनिष्ठा से काम करने वाले कर्मचारियों, पदाधिकारियों, पुलिसकर्मियों एवं अधिकारीयों की सुरक्षा करता है । न ही गरीब व पिडितों को न्याय देता है। 

      अतः एक सामान्य देश का नागरिक होने के नाते इस संविधान की प्रस्तावना में जितने भी धाराएं व अनुच्छेद हैं सभी को बदलने की जरूरत महसूस करता हूँ और संभव हो तो एक नया संविधान बनाने की मांग करता हूँ जिसमें आज के परिवेश को देखते हुए नीति नियम हो, उसमें दूरदृष्टी हो, उसमें न्याय और अन्याय की स्पष्ट व्याख्या हो, उसमें धर्म और समाज के लिए स्पष्ट नीति निर्देशक सिद्धांत हो, उसमें भारत की इस पूण्यभूमि पर केवल भारतवासियों का अधिकार हो, गरीब और अमीर के लिए एक नीति व नियम हो । अंततः उसमें सभी भारत वासियों का समान अधिकार और कर्तव्य हो। विशेषाधिकार केवल संवैधानिक पदों पर बैठे विशेष व विशेषतम व्यक्तियों को सेवाकाल तक सुनिश्चित हो। सरकारी अधिकारी, पदाधिकारी, संवैधानिक जनप्रतिनिधि आम जनता के प्रति जवाबदेह हो। यदि वे ऐसा करने में सक्षम नहीं है तो आम जनता द्वारा उसे पदच्युत करने का अधिकार हो। ( Recall ) 

नोट :- ऊपरोक्त में कई विंदु ऐसे भी हैं जो कदाचित आज भी लागू है लेकिन जब जवाबदेही की बात आती है और विशेषाधिकार की बात आती है तो जो समर्थ और सुरक्षित व्यक्ति है अपने को बचाने के लिए व अपने को निर्दोष साबित करने के लिए संविधान की व्याख्या केवल अपने हिसाब से करता है और मन के अनुरूप निर्णय ले लेता है जबकि आम जनता की नजरों में वह गुनाहगार है, अपराधी है, धोखेबाज व गद्दार है !! परिणाम है कि हमारा संविधान और संविधान के तीनों स्तंभ आम जनता के नजरों में अपनी सम्मान खो चुके हैं बल्कि कभी-कभी तो अनुचित भी दिखाई देते हैं। 

- बलवंत सिंह ठाकुर एडवोकेट नर्मदापुरम
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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