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जहाँ गूंजती थीं गोलियों की आवाज़ें, वहाँ गूंजीं ‘माँ भारती’ के नाम कविताएँ






श्री राम राष्ट्रीय साहित्यिक संस्था अयोध्या धाम के तत्वाधान में कश्मीर घाटी में बदला राष्ट्रवाद का सुर: जहाँ गूंजती थीं गोलियों की आवाज़ें, वहाँ गूंजीं ‘माँ भारती’ के नाम कविताएँ

श्रीनगर/जम्मू । कभी गोलियों की तड़तड़ाहट और बम धमाकों की गूंज से दहलने वाली कश्मीर घाटी आज पूरी तरह बदले हुए स्वरूप में नज़र आ रही है। जिस घाटी में कभी अलगाववाद और आतंक का खौफ छाया रहता था, आज वहाँ देशभक्ति और राष्ट्रवाद का एक नया सवेरा हुआ है। श्री राम राष्ट्र साहित्यिक संस्था युद्ध धाम के तत्वाधान में देश के विभिन्न कोनों से आए प्रसिद्ध कवियों ने अपनी ओजस्वी कविताओं और रचनाओं से पूरी घाटी को ‘माँ भारती’ के जयकारों से गुंजायमान कर दिया है। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार अशोक गोयल चक्रवर्ती ने की मंच को सुशोभित किया संस्था की राष्ट्रीय प्रभारी कवयित्री बीना गोयल मुख्य अतिथि अनिल गोयल और विशिष्ट अतिथि सुधीर बंसल, डॉ संजय जैन, वह डॉक्टर डीके वशिष्ठ रहे
कश्मीर में यह बदलाव न केवल ऐतिहासिक है, बल्कि यह घाटी में लौट रही अमन, शांति और मुख्यधारा से जुड़ाव का एक जीवंत प्रमाण भी है।
*अमन की वादियों में राष्ट्रवाद का शंखनाद*
हाल ही में आयोजित एक भव्य अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में देश के ख्यातिप्राप्त कवियों ने हिस्सा लिया। जब कवियों ने मंच से मातृभूमि की रक्षा, बलिदान और घाटी के बदलते परिवेश पर अपनी रचनाएँ पढ़ीं, तो पूरा सभागार 'भारत माता की जय' और 'वंदे मातरम' के नारों से गूंज उठा। स्थानीय युवाओं और नागरिकों की भारी मौजूदगी ने इस बात पर मुहर लगा दी कि कश्मीर की नई पीढ़ी अब आतंक और बंदूकों से तंग आकर शांति और विकास की राह पर चल पड़ी है।
*बंदूकों की जगह गूंज रहे हैं अमन के तराने*
एक समय था जब घाटी के लाल चौक और आस-पास के इलाकों में केवल सैन्य वाहनों के सायरन और मुठभेड़ों की आवाज़ें सुनाई देती थीं। लेकिन आज परिस्थितियाँ पूरी तरह बदल चुकी हैं। कवियों की कविताओं ने यह साबित कर दिया है कि:
• *गोलियों का स्थान शब्दों ने ले लिया है*: जो युवा कभी भटकाव की राह पर थे, वे आज देशप्रेम की कविताओं पर तालियाँ बजा रहे हैं।
*सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उदय*: कला, साहित्य और कविताओं के माध्यम से घाटी के लोगों को देश के बाकी हिस्सों से भावनात्मक रूप से जोड़ा जा रहा है।
• *खौफ का अंत*:
 स्थानीय लोगों में अब बिना किसी डर के राष्ट्रगान और देशभक्ति के गीतों को अपनाने का एक नया उत्साह देखा जा रहा है।
*कवियों ने बांधा समां, उमड़ा जनसैलाब*
 सम्मेलन में वीर रस और देशभक्ति की कविताओं को सबसे ज़्यादा सराहना मिली। कवियों ने अपनी कविताओं में कश्मीर को भारत का मुकुट बताते हुए यहाँ के वीरों और प्राकृतिक सुंदरता को नमन किया। कार्यक्रम में मौजूद मुख्य अतिथियों ने कहा कि कविताएँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं होतीं, बल्कि वे समाज को नई दिशा देती हैं। आज कश्मीर की धरती पर कवियों का यह संगम इस बात का सबूत है कि घाटी अब मुख्यधारा की प्रगति में कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है।
*एक नए कश्मीर का उदय*
श्रीनगर के एक स्थानीय निवासी ने भावुक होते हुए कहा, "हमने लंबा दौर बंदूकों के साए में गुजारा है, लेकिन आज जब हम अपने बच्चों को देशप्रेम की कविताओं पर झूमते देखते हैं, तो दिल को सुकून मिलता है। हम शांति चाहते हैं और यह कार्यक्रम इसी नई शुरुआत का प्रतीक है।"
निश्चित रूप से, घाटी में गोलियों की आवाज़ों का थमना और उसकी जगह माँ भारती के नाम कविताओं का गूंजना इस बात की पुष्टि करता है कि कश्मीर अब विकास, शांति और अखंड राष्ट्रवाद के नए पथ पर अग्रसर है। कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार अशोक गोयल, वरिष्ठ कवयित्री बीना गोयल, मंजू गुप्ता, अशोक कुमार गुप्ता, शशि किरण गुप्ता, कुमकुम वशिष्ठ, मधु चौबे, महेंद्र शर्मा, दीपा शर्मा, प्रमोद गर्ग, रामनाथ चौबे, डॉक्टर संजय जैन, सुनील कुमार शर्मा, उर्मिल गोयल, योगेंद्र अग्रवाल, निकिता, उमेश इंदु, प्रतीक भारद्वाज रहे । अंत में सभी आगंतुकों का राष्ट्रीय अध्यक्ष कवि अशोक गोयल ने आभार प्रकट किया ।
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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