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बाल कहानी : अनन्या के नौ संकल्प-विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल


बाल कहानी : 

अनन्या के नौ संकल्प

-विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल

नवरात्रि आने वाली थी। अनन्या के घर में खूब चहल-पहल थी। माँ पूजा की तैयारी कर रही थीं, पिताजी बाजार से फूल और फल लाए थे और दादी सुबह से ही देवी के भजन गुनगुना रही थीं। अनन्या को रात में गरबा खेलने और प्रसाद में मिलने वाली मिठाइयों का इंतजार था।

पूजा की थाली सजाते हुए उसने दादी से पूछा, “दादी, हम नौ दिनों तक माँ दुर्गा की पूजा क्यों करते हैं? क्या केवल पूजा करने से माँ खुश हो जाती हैं?”

दादी मुस्कराईं। उन्होंने अनन्या को पास बिठाया और बोलीं, “बेटा, नवरात्रि हमें याद दिलाती है कि अच्छाई की शक्ति हमेशा बुराई से बड़ी होती है। माँ दुर्गा के नौ रूप हमें साहस, धैर्य, ज्ञान, करुणा और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देते हैं। उनकी पूजा तभी सार्थक है, जब हम इन गुणों को अपने जीवन में उतारें।”

अनन्या कुछ सोचने लगी। अगले दिन उसे दादी की बात समझने का अवसर मिल गया।

वह स्कूल जा रही थी। रास्ते में उसने देखा कि कुछ बच्चे अपनी सहपाठी रानी को चिढ़ा रहे थे। रानी की यूनीफार्म  पुरानी थी। बच्चे उसका मजाक उड़ा रहे थे। रानी की आँखों में आँसू थे, लेकिन वह चुपचाप सब सह रही थी।

अनन्या का मन दुखी हो गया। वह आगे बढ़ी और बच्चों से बोली, “किसी के कपड़े पुराने होने से वह छोटा नहीं हो जाता। हम सबको एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए। अगर तुम्हारे साथ कोई ऐसा करे, तो तुम्हें कैसा लगेगा?”

बच्चे चुप हो गए। अनन्या ने रानी का हाथ थामा और उसे अपने साथ कक्षा में ले गई। उसने अपनी रंगीन पेंसिलें रानी के साथ बाँट लीं। उस दिन पहली बार रानी खुलकर मुस्कराई।

शाम को घर लौटकर अनन्या ने दादी को सारी बात बताई। दादी ने उसे प्यार से गले लगा लिया।

“दादी, क्या आज मैंने माँ दुर्गा की पूजा की?” अनन्या ने पूछा।

“हाँ बेटा! जब तुम किसी दुखी का सहारा बनती हो, किसी कमजोर के पक्ष में खड़ी होती हो और अन्याय का विरोध करती हो, तब तुम अपने भीतर की शक्ति को पहचानती हो। यही माँ दुर्गा की सच्ची सीख है।”

अनन्या की आँखें चमक उठीं। उसने एक छोटी-सी कॉपी निकाली और पहले पन्ने पर लिखा, मेरे नौ संकल्प।

पहला—मैं निर्भय होकर सच बोलूँगी।

दूसरा—किसी का मजाक नहीं उड़ाऊँगी।

तीसरा—सबका सम्मान करूँगी।

चौथा—जरूरतमंद की मदद करूँगी।

पाँचवाँ—प्रकृति और पशु-पक्षियों की रक्षा करूँगी।

छठा—भोजन और पानी बर्बाद नहीं करूँगी।

सातवाँ—मन लगाकर पढ़ूँगी और दूसरों को भी पढ़ने में मदद करूँगी।

आठवाँ—अन्याय होते देखकर चुप नहीं रहूँगी।

नौवाँ—सबके प्रति प्रेम और करुणा रखूँगी।

नवरात्रि के अंतिम दिन घर में कन्या पूजन की तैयारी थी। अनन्या ने रानी को भी अपने घर आमंत्रित किया। दोनों ने साथ बैठकर प्रसाद खाया और खूब बातें कीं।

पूजा के बाद दादी ने पूछा, “तो अनन्या, इस नवरात्रि में तुम्हें क्या मिला?”

अनन्या ने अपनी संकल्प-कॉपी दिखाते हुए कहा, “दादी, मुझे समझ में आ गया कि माँ दुर्गा की शक्ति केवल मंदिरों में नहीं, हमारे भीतर भी होती है। जब हम डर के बजाय साहस, नफरत के बजाय प्रेम और अन्याय के बजाय अच्छाई का साथ चुनते हैं, तब वही शक्ति हमारे कामों में दिखाई देती है।”

दादी ने प्रसन्न होकर उसे गले लगा लिया।

मंदिर में आरती के दीप जगमगा रहे थे। अनन्या के मन में भी एक दीप जल उठा था,ऐसा दीप, जो केवल नौ दिनों तक नहीं, जीवन भर जलता रहना था।

-विवेक रंजन श्रीवास्तव 
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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