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काव्य : बसंत - डा.नीलम अजमेर

 काव्य 

बसंत




महकती फिजाओं में घूम

,हवाएँ बौराई हैं।वनदेवी

को रिझाने मदन ने पुष्प- कमान चलाई है।

बसंत

पाकर स्पर्श कुनकुनी धूप का,

कलियों ने ली अँगड़ाई है।पुष्पमुख चूम-

चूमकर भौरा हुआ शैदाई है।

धानी चुनर ओढ़ धरा 

इतराई है।सरसों सरसाई,

आम्र बौंरो को देख-देख

कोयल कुहुकुआई है।

सिहरते सूरज ने ,फिर धूप की ताकत पाई है।

दिनभर गगनांचल में

गर्मी ने धूम मचाई है।

नव पल्लव,नवकोंपलों

ने, शाख-शाख सजाई है।

बासंती फूलों की चमन में

,हुमहुमा कर बहार आई है।


   -  डा.नीलम 

अजमेर




देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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