काव्य
बसंत
महकती फिजाओं में घूम
,हवाएँ बौराई हैं।वनदेवी
को रिझाने मदन ने पुष्प- कमान चलाई है।
बसंत
पाकर स्पर्श कुनकुनी धूप का,
कलियों ने ली अँगड़ाई है।पुष्पमुख चूम-
चूमकर भौरा हुआ शैदाई है।
धानी चुनर ओढ़ धरा
इतराई है।सरसों सरसाई,
आम्र बौंरो को देख-देख
कोयल कुहुकुआई है।
सिहरते सूरज ने ,फिर धूप की ताकत पाई है।
दिनभर गगनांचल में
गर्मी ने धूम मचाई है।
नव पल्लव,नवकोंपलों
ने, शाख-शाख सजाई है।
बासंती फूलों की चमन में
,हुमहुमा कर बहार आई है।
- डा.नीलम
अजमेर
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