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तिलचट्टा,हां तिलचट्टा !! - वंदना दुबे, धार


 तिलचट्टा,हां तिलचट्टा !! 

    भूरे-कत्थे रंगका, कड़े चमकदार पंखों वाला का एक छोटा-सा कीट। सफेद बदबूदार चिपचिपे पदार्थ का स्वामी!

सबसे बड़ी बात,लोगों की घृणा का पात्र।

तिलचट्टे को देखते ही अच्छे-अच्छे बहादुरों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

मारे डर के, अपने कपड़े समेटे ,बिजली की फुर्ती के साथ कोई तखत पर, तो  कोई कुर्सी पर चढ़कर दोनों हाथों से हट-हट करता चीखकर उसे दूर जाने के लिए कहता है।

बेचारा छोटा-सा तिलचट्टा इस चीख को प्यार की पुकार समझ कर, खुशी से झूमता हुआ, भगाने वाले की ही तरफ आने लगता है।

फिर क्या?  जो चीज हाथ में आई उससे तिलचट्टे का राम राम सत्य---।

बेचारा तिलचट्टा ! 

जो कभी-कभार ही दिन में दिखाई देता है। पूरा दिन संयम और धैर्य बनाए रखकर रात के अंधेरे का इंतजार करता है। रात को बत्ती बुझते ही, सिंक और बेसिन से बाहर निकलकर रसोईघर में तफरी करने लगता है।

तिलचट्टा-

(तिल-तिल भोजन कण चाटने वाला) या 

(तेल चाटने वाला)

आखिर क्या ले लेता है वो किसी का ? मच्छर और खटमल तो शरीर का खून चूस लेते हैं,पर बेचारा तिलचट्टा ---

किसी को कोई शारीरिक हानि भी नहीं पहुंचाता। बत्ती जलते ही चुपचाप यहां- वहां छिप जाता है।

लोग शौक से कुत्ता, बिल्ली, खरगोश,तोता और जाने कितने पशु- पक्षी पालते हैं। उनके भोजन, शेंपू और दवाइयों पर लाखों रुपए खर्च कर देते हैं, उनके साथ समय बिताते हैं,उनके लिए समय निकालते हैं।

पर तिलचट्टा !!

इतना बदसूरत भी तो नहीं, जो उससे इतनी घृणा की जाए !!

इतनी बड़ी दुनिया में आखिर कोई तो होगा जिसे तिलचट्टे से प्रेम हो? 

जिसने कभी तिलचट्टे के शरीर पर प्यार से हाथ फेरा हो?

कभी गोद में बिठा कर उसकी मूंछ और उसके पैरों से अठखेलियां की हो? 

कभी खाना खाते हुए अपनी ही प्लेट में बैठा कर, उसे साथ खाना खिलाया हो? 

कड़कड़ाती ठंड में लाड़ से कभी, अपने साथ रजाई में उसे दुबका लिया हो? 

या

उसकी छोटी-छोटी उड़ानों को प्रोत्साहित कर खिलखिला कर हंसा हो?

कोई तो होगा???

जिसने उसे समझा हो?

हर कोई तिलचट्टे से नफ़रत ही क्यों करता है?

तिलचट्टे को स्पैनिश में *काॅकरोच* कहते है।

 *Cocroch theory* ( तिलचट्टे का सिद्धांत ) 

इस प्रसिद्ध व्यवसायिक कहावत के अनुसार- किसी व्यवसायिक प्रणाली में एक समस्या या भ्रष्टाचार के दिखाई देने पर समझ लेना चाहिए कि उसके पीछे कई समस्याएं दबे पांव आ रही हैं। 

यहां भी तिलचट्टों को समस्याजन्य ही निरुपित किया गया।

अब केवल 

*तिलचट्टे की तरह लड़ना-* कहावत ही उसके कठिन परिस्थितियों में भी, हार न मानते हुए संघर्ष को दर्शाती है। 

कि-मुसीबत के समय तिलचट्टा संघर्ष करता है और जान बचाने के लिए अंत में उड़ने लगता है।

पर--- हाय रे ! तिलचट्टे !

 तेरी इस अति घबराहट भरी उड़ान का भी मज़ाक़ उड़ाया गया।

*काॅकरोच की मौत आती है तो वह उड़ने लगता है* 

फिल्म अग्निपुत्र में अभिनेता सुरेश ओबेरॉय ने जब यह  डायलॉग बोला तो *काॅकरोच* शब्द ट्रेंड में आ गया था ।

 अब इतने सालों बाद एक बार फिर देश भर में काॅकरोच ट्रेंड में हैं ।

सिस्टम ने उनकी आत्मा पर गंभीर चोट की है कि-

 समाज में कुछ ऐसे लोग होते हैं जो बेरोजगार हैं, पेशे में कोई जगह नहीं बना पाते, जाली डिग्रियों के सहारे वकालत और अन्य सम्मानित पेशे में घुस जाते हैं। ऐसे बेरोजगार युवा काॅकरोच, कुछ मीडिया में गए, कुछ आरटीआई एक्टिविस्ट बनकर सिस्टम पर हमला करते हैं।

इस अपमान जनक टिप्पणी से भीतर तक आहत उन बेरोजगार युवा काॅकरोचों ने मोर्चा संभाल लिया। संगठन में बड़ी शक्ति होती है।

बेरोजगार युवाओं ने सांकेतिक रुप से एक पार्टी बना ली जिसका नाम है-

काॅकरोच जनता पार्टी

इसमें  *मैं भी काॅकरोच* का नारा लगाते हुए, एक-दो नहीं, बल्कि एक करोड़ काॅकरोच शामिल हो गए।

अंधेरों में पलने वाले अब रौशनी पर कब्जा करने, सिस्टम की रसोई पर टूट पड़ने को अमादा हैं।

इसलिए -

तिनका कबहुं न निंदिये, जो पांवन तर होय ।।

कबहुं गिरी आंखन परे, तो पीर घनेरी होय ।।

अर्थात् -  पैरों तले दबे तिनके को भी तुच्छ समझकर उसकी निंदा या अपमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि मौका आने पर वही छोटा-सा तिनका उड़कर आंखों में गहरी पीड़ा दे सकता है।

-वंदना दुबे, धार

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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