लघुकथा :
बराबरी
“मम्मी, आपको पापा से प्यार क्यों हुआ था?”
माँ हँस पड़ीं—
“क्योंकि वह बहुत अच्छे थे।”
“और शादी क्यों की?”
माँ की हँसी धीमी पड़ गई।
“क्योंकि तब लगा था कि अच्छा इंसान ही शादी के लिए काफी है।”
“फिर?”
“फिर समझ आया कि शादी में सिर्फ अच्छा इंसान नहीं, बराबरी भी जरूरी होती है— सोच की, हैसियत की, सपनों की, जीवनशैली की…”
बेटी ध्यान से सुन रही थी।
“जहाँ बराबरी नहीं होती ना बेटा, वहाँ प्यार धीरे-धीरे या तो एहसान बन जाता है… या बोझ।”
- डॉ अंजना गर्ग ( सेवानिवृत)
म द वि रोहतक
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कथा कहानी
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