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सरोकार : महिला सरपंचों के पदों पर दबंगों का कब्जा - . चन्दर सोनाने,उज्जैन


 सरोकार -

 महिला सरपंचों के पदों पर दबंगों का कब्जा

- डॉ. चन्दर सोनाने

                        हमारा देश भले ही 15 अगस्त 1947 को आजाद हो गया हो, संविधान द्वारा त्रिस्तरीय पंचायत राज व्यवस्था में सरपंच, जनपद और जिला पंचायतों में अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान कर लिया गया हो, मध्यप्रदेश में उक्त सभी पदों पर महिलाओं का 50 प्रतिशत आरक्षण भी कर दिया गया है, किन्तु आज भी दलित और आदिवासी महिला सरपंचों के पदों पर दबंगों का कब्जा है। चुनी हुई महिला सरपंच नाममात्र की है। अधिकांश सरपंचों की सील और हस्ताक्षर पर परिजनों या दबंगों का कब्जा है। वे ही सरपंची कर रहे हैं। 

                        देश को आजाद हुए करीब 77 वर्ष होने जा रहे है। किन्तु आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में महिला सशक्तिकरण का नारा केवल कागज पर ही है। हाल ही में एक खबर आई है, वह चिंताजनक और शर्मनाक है। हाल ही में मध्यप्रदेश के भोपाल, ग्वालियर और सागर संभागों के 15 जिलों की 3707 पंचायतों में किए गए सर्वे में चौंकाने वाली जानकारी मिली है। सरपंच के पद पर चुनी हुई महिला सरपंच की बजाय या तो उसके पति, बेटा, ससुर, जेठ और देवर पंचायत का कामकाज देख रहे है या दबंगों ने कब्जा कर रखा है। 

      आरक्षित महिला पंचायतों की महिला सरपंचों को यह भी पता नहीं कि गाँव में क्या-क्या विकास कार्य चल रहे हैं। यही नहीं अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित पंचायतों की महिला सरपंच मजदूरी और अन्य के घरों में झाड़ू-पोछा करके अपना गुजारा कर रही है। इतना ही नहीं कुछ महिला सरपंच तो चुनाव जीतने के बाद प्रमाण पत्र लेने तक ही सरपंच रही। इसके बाद उनके प्रमाण पत्र दबंगों ने उनसे छीन लिए। इन दबंगों के कब्जे में ही सरपंच की सील होती है और सरपंच के पद पर वही हस्ताक्षर भी कर रहे हैं। 

              दलित और आदिवासी महिला सरपंचों की सीटों की वास्तविकता बताने के लिए कुछ बानगी प्रस्तुत है। मध्यप्रदेश की शिवपुरी जिले की बदरवास की धामनटूक पंचायत की आदिवासी महिला सरपंच विरूला बाई 2022 में सरपंच चुनी गई। तब से ही गाँव का ही दंबंग उपसरपंच श्यामबिहारी सरपंची कर रहा है। महिला सरपंच मजदूरी कर अपना गुजर बसर कर रही है। उसके घर में शौचालय तक नहीं है। सरपंच बनने के बाद आज तक उसे पंचायत की किसी बैठक में भी नहीं बुलाया गया। पिछले 2 साल में पंचायत में 1 करोड़ 65 लाख के काम हो चुके है, लेकिन इनमें से किसी में भी उससे दस्तखत नहीं लिए गए।

              इसी प्रकार मुरैना जिले की कोरसा जनपद पंचायत की विंडवा पंचायत में दलित महिला मुन्नीदेवी सरपंच है। लेकिन सरपंची गाँव के उपसरपंच कृष्णवीर सिंह कर रहे है। सरपंच से संबंधित सभी सील उसके कब्जे में है और उस पर हस्ताक्षर का काम भी कृष्णवीर ही कर रहे है। सचिव बृजकिशोर शर्मा ने चुनी हुई सरपंच से कभी कोई काम और हस्ताक्षर आदि नहीं लिया। 

                दलित और आदिवासी महिला सरपंचों के पद पर वे चुनाव तो जीत गई, किन्तु उनके वास्तविक अधिकारों का इस्तेमाल गाँव के ही दबंग लोग कर रहे हैं। यही नहीं वे सरकारी पैसों का दुरूपयोग भी कर रहे है। और जाँच में दोषी पाए जाते हैं तो इन दबंगों की बजाय भोली- भाली महिला सरपंच ही कानून के दायरे में आ जाती है। ऐसी कई महिला सरपंच पर केस दर्ज हुए और रिकवरी भी निकली। रिकवरी की यह राशि महिला सरपंच मजदूरी करके चुका रही है। यही नहीं वे कोर्ट कचहरी के भी चक्कर लगा रही है। इसके कुछ उदाहरण इस प्रकार है -

                 शिवपुरी जिले की पोहरी जनपद पंचायत की ग्राम पंचायत झिरी में आदिवासी महिला पप्पी 2022 में सरपंच चुनी गई। दबंगों ने ठेके लेकर अलग- अलग कामों में फर्जी भुगतान निकाला। अब सरपंच पर 24 लाख 31 हजार रूपए की वसूली निकली है। वह जिला पंचायत और कलेक्टोरेट में शिकायत कर न्याय की गुहार लगा रही है। इसी प्रकार वर्ष 2010 में हुए पंचायत चुनाव में ईसागढ़ क्षेत्र की ग्राम पंचायत बमनावर की सीट आदिवासी महिला के लिए आरक्षित हुई। दबंगों ने मुलियाबाई को चुनाव लड़वाकर सरपंच बनवा दिया। दबंगों ने बाद में आदिवासी बस्ती में 2 लाख 40 हजार रूपए की राशि स्कूल भवन के लिए स्वीकृत की। निर्माण कागजों में ही हुआ। वास्तव में काम हुआ ही नहीं और राशि हड़प ली गई। बाद में जाँच में स्कूल भवन नहीं मिलने पर सरपंच मुलियाबाई के खिलाफ केस दर्ज कर लिया गया। बड़ी मुश्किल से वह उस केस से बची। मुलियाबाई 2015 तक सरपंच रही। वह मजदूरी करके अपना गुजर बसर कर रही है। इसी प्रकार चंदेरी जनपद की ग्रामपंचायत खागल दूधराई में भी महिला सरपंच मुन्नीबाई के नाम पर 14 लाख 39 हजार रूपए का काम कागज में ही बताकर गबन किया गया। गड़बड़ी सामने आने पर सरपंच के विरूद्ध केस दर्ज हो गया। शिवपुरी जिले के महिला सरपंचों ने कलेक्टर को ज्ञापन देकर शिकायत की कि सरपंच वे है किन्तु सरपंची दबंग लोग कर रहे है। उनके साथ न्याय किया जाए।

                उक्त उदाहरण केवल बानगी के तौर पर है। प्रदेश की अधिकांश दलित और आदिवासी सरपंच की सीटों पर कागज पर तो महिला सरपंच चुनी गई है, किन्तु वास्तविक सरपंची उसके परिजन या दबंग ही कर रहे हैं। उन्हें पंचायतों की बैठकों में भी बुलाया नहीं जाता। इस प्रकार के उदाहरण अत्यन्त दुखद है और चिंताजनक है। राज्य सरकार को चाहिए कि त्रिस्तरीय पंचायत राज व्यवस्था के मूल उद्देश्य को ध्यान में रखकर केवल कागज पर ही महिला सशक्तिकरण न करें, बल्कि यह भी देंखे कि महिला सरपंच सही मायने में अपने अधिकारों का उपयोग कर पा रही है या नहीं। सरपंच के पद पर यदि परिजन या दबंग सरपंची करते हुए पाए जाए तो उनके विरूद्ध सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि चुनी हुई सरपंचों को अपने अधिकार मिल सके। चुनी हुई सरपंच की बजाय यदि उसके परिजन या दबंग काम करते हुए पाए जाने पर संबंधित पंचायत के सचिव, जनपद पंचायत और जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। इसके लिए जरूरत पड़ने पर कानून में भी संशोधन करना पड़े तो किया जाना चाहिए, तभी वास्तव में महिला सशक्तिकरण हो पाएगा अन्यथा यह केवल कागज पर ही रहेगा।

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देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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