सुनो बाजीगर
सुना है तुम्हारे लिए सब संभव है,
तुम जो चाहो, सो कर सकते हो l
तो सुनो न बाजीगर,
कोई ऐसा जादू करो,
कि हर इंसान में बैठे दानव को,
निकाल बाहर करो l
समाज में फैली भ्र्ष्टाचार और दुराचार,
मंहगाई और बेरोजगारी की बीमारी,
अपनी छड़ी घुमा कर,
दूर कर दो l
हाँ बाजीगर, मैंने देखा है तुम्हे कई बार,
किसी भी चीज को,गायब करते हुए l
तो सुनो, ये जाति पांति, भेदभाव,
ये पाखंड और ढकोसले भी,
गायब कर दो न अपनी छड़ी घुमा कर l
और हाँ, तुम वही बाजीगर हो न,
जो एक कबूतर के कई कबूतर बना कर,
दर्शकों के बीच उड़ा देते हो l
तो सुनो, शांति और भाईचारे का,
ऐसा एक कबूतर तो उड़ा दो l
बहुत बढ़ गए हैँ अपराध मेरे शहर मे,
शायद कुछ शांति बहाल हो जाये,
और तुम्हारी बाजीगरी,
देश हित में,
काम आ जाये l
- बिन्दु त्रिपाठी , भोपाल
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काव्य
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