काव्य :
जहाँ क़दर न हो
मेरे बारे में कोई क्या कहता है,
इसकी चिंता छोड़, दी है मैंने,
ज़िंदगी दूसरे की शर्तों पर,
जीना छोड़, दी है मैंने।
सफ़ाई देने की आदत,
अब तो छोड़, दी है मैंने,
जहाँ मिलती हैं खुशियाँ,
उधर राह मोड़, दी है मैंने।
जो कपटी दिल के हैं,
उनको छोड़ दिया मैंने,
जहाँ दिल को सुकून मिले,
वहाँ नाता जोड़, ली है मैंने।
साहित्य सृजन, लेखन से,
बढ़िया रिश्ता कोई नहीं,
जलन द्वेष में लिप्त लोगों से,
मेलजोल छोड़, दी है मैंने।
- गोपाल मोहन मिश्र दरभंगा
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