आलेख :
पर्यावरण एवं भारतीय प्रबंधन
इस विषय पर कुछ भी कहने से पहले हमको यह समझना बेहद जरूरी है कि, *पर्यावरण है क्या*?
हमारे आसपास का वह सारा वातावरण जिसमें कि, हवा, पानी, पृथ्वी, वन एवं वन्यप्राणी और हम सब मिलकर या अकेले प्रभावित करते हैं, या हो जाते हैं वही पर्यावरण है।
पर्यावरण कैसे प्रभावित होता है?
पिछले अनेक वर्षोँ से वैज्ञानिकों एवं पर्यावरणविदों ने कड़े अध्ययन / खोज के बाद यह पाया कि, मनुष्य ही एकमात्र वह प्राणी है जो अनेकानेक प्रकार से पर्यावरण को क्षति पहुंचता आ रहा है। इसमें प्रमुख रूप से है
1- *वनों की अंधाधुंध कटाई*
अब चाहे यह विकास के नाम पर हो या दैनिक आवश्यकता पूर्ति हेतु लकड़ी की बढ़ती माँग एक प्रमुख
कारण है। दिन प्रति दिन बढ़ती ललक के चलते हम प्रकृति के साथ लगातार अन्याय करते आ रहे हैं। वृक्ष लगाना उसे संरक्षित करना कम गति से हो रहा है। परिणाम स्वरूप हमारा प्राकृतिक कोष अब समाप्त होने की कगार पर है। कहा भी गया है कि,......
*जहाँ जहाँ पाँव पड़े संतन के*,
*तहाँ तहाँ हो गया बंटा धार*।
यह किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं है, पर एक कड़वी सच्चाई है।
अगर भारत की ही बात करें, तो वर्ष 1947 मे वनों का घनत्व 33% से था। अंग्रेजी शासन काल में कटाई पर कड़े प्रतिबंध थे। आज़ादी के बाद स्वयं को स्थापित करने और विकसित करने की होड़ में हमारे बुजुर्गो द्वारा जुटाई यह धरोहर शैन: शैन: घटने लगी है। यध्यपि ब्रिट्रिश शासनकाल में बनाया *वन अधिनियम 1027* अस्तित्व में था। यह भी उन्हीं की पर्यावरण के प्रति सजगता का परिणाम था। आज़ादी के बाद लगातार हो रहे वनों के दोहन से देश में पहलीबार *नेशनल फारेस्ट पॉलिसी वर्ष 1988* बनाई गयी, जिसमें 33% वन अच्छादन का उल्लेख है।
आज वास्तविकता यह है कि, *Forest survey of इंडिया, देहरादून के सर्वेक्षण के अनुसाररिपोर्ट में देश का वन घनत्व लगभग 23% ही रह गया है*। इसी संस्था की *वर्ष 2009 की और भी स्पष्ट किया है कि, भौगोलिक क्षेत्रफल 32लाख 87 हज़ार 263 वर्ग कि. मी. है, वहीं वनों का क्षेत्रफल 7लाख 69हज़ार वर्ग कि.मी. ही है*।
प्रबंधन
1- वनों की अंधाधुंध कटाई पर सख्ती से रोक।
2- कटाई पर दंड विधानमें सख्ती।
3- व्यापक स्तर पर वृक्षारोपण
4- उन पौधों का संरक्षण कम से कम पौधों की ऊंचाई 5फुट तक होजाये तब तक।
*भारत के संविधान - 1950 के आर्टिकल 51-A /g* के प्रावधान के अनुसार......
"" *भारत के प्रत्येक नागरिक (स्त्री / पुरुष ) का यह परम् कर्तव्य है कि, वह अपने पर्यावरण जल, वन एवं वन्य प्राणी को बचाएँ। उन्हें संरक्षित एवं संवर्धन करें*।
इसीतरह *आर्टिकल 48-A के अनुसार यह राज्य सरकारों का भी दायित्व है कि, वे अपने पर्यावरण को बचाएँ। यह दायित्व मात्र वन विभाग का नहीं हम सबका है*।
2- जल प्रदूषण
कितना आसान होता है कि, अपने घर, फैक्ट्री, की गंदगी को नाली, सिंक, कमोड़ में बहा देना, या यूँ ही बाहर फेंक देना। क्या हमने ये कभी भी सोचा कि, आखिर हमारे द्वारा बहाई गईं ये गंदगी जाती कहाँ है? ठीक इसीप्रकार हम विभिन्न धार्मिक स्थलों पर पूजा एवं शुद्धि करण के नाम पर सभी पवित्र नदियों को प्रदूषित करते आ रहे हैं। आज गंगा, यमुना, कावेरी, चंबल, सरस्वती सभी नदियाँ वेंटीलेटर पर हैं। सरकारें करोड़ों रूपये शुद्धि करण में लगा रही है, और हम सतत प्रदूषित करते जा रहे हैं।
इसी प्रकार बड़ी बड़ी फैक्ट्रीयों के रासायनिक कचरे को नदियों में बहा कर अंततः समुद्र में धकेल रहे हैं। जरा सोचिये! उन्नत खेती के नामपर खेतोँ में डाली जा रही *यूरिया, नाइट्रेट, इनसेक्टिसाइड़स, DDT*, आदि हमारी भावी संतानों को प्रभावित नहीं कर रहीं हैं।
प्रबंधन
1- अच्छे नागरिक की तरह *घर की सिंक में रसायन* न बहाएं।
2- *पोलथिन, प्लास्टिक के स्थान पर बायोडिग्रेडिबल री-साइकिल* वाले कैरी बैग्स का उपयोग करें।
3- हैंड पंप की खुदाई से छलनी हो रही धरती को बचाएँ।
4- *रैन वाटर हार्वेस्टिंग* सिस्टम प्रत्येक घर में अनिवार्य करें।
5- *कैमिकल और कैमिकल खाद के स्थान पर ऑर्गेनिक खाद* का प्रयोग करें। किचिन वेस्ट को भी खाद के रूप में प्रयोग करें।
6- घर - फैक्ट्री के *रासायनिक जहर को नदी नालों में बहाने की अपेक्षा छोटे - बड़े गड्ढा बनाकर जमीं में अवशोषित* किया जा सकता है।
7- बड़े बड़े कारखाने लगाने की परमिशन में ही यह सुनिश्चित किया जाये कि, इससे होने वाले प्रदूषण और उत्सर्जन पर *EIA* (इन्वार्यामेन्टल
एम्पेक्ट असेसमेन्ट ) की शर्तों को पूरा किया जाये।
8- गणेश पूजा, दुर्गा पूजा, मोहर्रम आदि त्यौहारों पर पर प्रतिमा विसर्जन पूर्व निर्धारित स्थानों पर ही किये जाएँ। प्रतिमाएँ छोटी एवं मिट्टी की हों तो और भी बेहतर है।
3-वायु प्रदूषण
जल प्रदूषण की तरह ही घर, फैक्ट्री, वाहन, से उत्सर्जित जहरीली गैस - *क्लोरीन, कार्बन मोनो ऑक्साइड, सल्फाइड, नाइट्रेट*, जैसी गैसीय उत्सर्जन को वातावरण में छोड़ने से जो प्रदूषण हो रहा है, यह देखने है तो दिल्ली, कोलकत्ता, मुंबई, बैंगलरू हैदराबाद आदि जैसी मैगा सिटीज में देखें। वहाँ कभी कभी दिन के 12:00 बजे भी वायु प्रदूषण रूपी दानव का अंधेरा सूर्य की किरणों को जमीं छूने भी नहीं देता है।
प्रबंधन
1- प्लास्टिक को जलाने की बजाय *गड्ढे में दबाएं*।
2- डीज़ल / पेट्रोल के स्थान पर *CNG* को बढ़ावा दें।
3- कोयलों के स्थान पर *सोलर एनर्जी* को उपयोग में लाएं।
4- कारखानों के उत्सर्जन के लिए लगाई गईं *चिमनी के मुहने पर ही शुद्धिकरण* हेतु व्यवस्था करें।
5- *AC / डीप फ्रीज़र से उत्सर्जित क्लोरो, फ्लोरो कर्बनिक* गैसों में कमी लानी होगी, अन्यथा O2 ओजोन परत में और भी छिद्र होने की संभावना बढ़ जाएगी। तब *अल्ट्रावायलेटस रेज़ तथा इफ़्रारेड रेज़* के करण वातावरण और भी गर्म होगा। यह *ग्लोबल वर्मिंग* के लिए गंभीर चेतावनी होगी।
अवैध उत्खनन
माईनिंग के नाम पर हीरा पन्ना संगमरमर, कोयला कच्चा पेट्रोलियम, तेल, और भी न जानें क्या क्या खोद खोद कर धरती को खोखला किया जा रहा है। शासकीय योजनाओं के अंतर्गत इसी माइनिंग समझ में एक हद तक आती है, पर क्या एजेंसियाँ चाहें सरकार के लिए ही काम क्योँ न करतीं हों क्या वे निर्धारित क्षेत्र और कोटे में करतीं हैं? यदि सतत प्रयोग प्रणाली से ऐसा होता तो *धनबाद और चसनाला कोयला खदान* जैसे हादसे नहीं होते।ऐसे कितने ही उदाहरण हैं, जिसमें लौह अयस्क, मैगज़ीन, हीरा पन्ना की निकासी के नाम पर हज़ारों हैक्टेयर वन क्षेत्रों की आहुति अभी तक दीं जा चुकी है।
प्रबंधन
1- ऐसी हर *नई खदान प्रतिबंधित* हो जो वन क्षेत्र का क्षरण कर रही है।
2- *रिक्त खदानों की भूमि पर वृक्षारोपण* किये जाएँ। इस कार्य के लिए कम्पनी मालिक से आर्थिक सहायता ली जानी चाहिये *वन क्षेत्र की सीमा से 250 मीटर तथा नेशनल पार्क की सीमा से 1km की परिधि एक्ट के अनुसार प्रतिबंधित* है। वन विभाग, माइनिंग विभाग एवं प्रशासन इसे सुनिश्चित करें। क़ानून के दायरे के बाहर चल रही सभी माइनिंग बंद कर दीं जाएँ।
4- बड़े बड़े राष्ट्रीय राज्य मार्ग एवं रेल्वे ट्रेक्स जो नए प्रस्तावित किये जा रहे हैं, सभी मार्गो को वन क्षेत्र से वृक्ष काट कर बनाये जाने के *अपेक्षा टनल या ओवर ब्रिज़* बनाये जाएँ। इससे मानव और वन्यप्राणी स्वतंत्र रूप से आते जाते रहेंगे। कहीं कहीं इसपर कार्य होने लगा है।
लगता तो यह कठिन है, पर हमारे ही इतिहास में त्रेतायुग में राम सेतु ने भारत और श्री लंका को जोड़ा था। *जहाँ 70 के दशक में अमेरिका नील आर्मस्ट्रांग को चाँद पर भेजनें के लिए अरबों डॉलर खर्च* कर सकता है, एवं *गॉड पार्टिकल्सकी खोज में खरबों डॉलर्स* व्यय किये जाते हों, तो क्या हम देश की वन भूमि बचाने के लिए ऊपर दिये विकल्प और सुझावों पर अमल नहीं कर सकते?
आवश्यकता है दृढ़ इच्छा शक्ति, राजनैतिक सोच एवं माननीय न्यायलय के हस्तक्षेप की।
- कमल चंद्रा
277-रोहित नगर, फेज -1
बावड़िया कलां, E-8एक्सटेंशन
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