काव्य :
कुसूर
किसको रोता हुआ नहीं देखा,
जागे सोता हुआ नहीं देखा।।
किससे कहना, कौन सुनता यहाँ,
किस्से आख़िर कौन बुनता यहाँ।
आँखों का तो कुसूर है इतना,
सब कुछ होता हुआ नहीं देखा।
मुट्ठी में रेत दबाये हैं हम,
कितना क्या आज बचाये हैं हम।
सब समेटे हुये तो बैठे थे,
जाता-खोता हुआ नहीं देखा।
किसका कुनबा, अपना कौन कहे,
सबने देखा, लब ये मौन रहे।
ज़हर ज़ुबां है चढ़ी, बोलती है,
विष भी बोता हुआ नहीं देखा।
हमने बोला जी ले पल तू भी,
कल को हो जायेगा कल तू भी।
खुशियाँ आनी भी जानी जग में,
पर संजोता हुआ नहीं देखा।
किसके हिस्से, वो क्या बोलेगा,
बिका-बिका सा मुँह क्या खोलेगा।
पन्ने भर-भर लिखा नहीं क्या कुछ,
कुछ तो होता हुआ नहीं देखा।।
©रजनीश "स्वच्छंद", दिल्ली
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