गजल
दोहा गीतिका
मोहब्बत की दुकान का मत पूछो कुछ हाल
ईर्ष्या द्वेष घमंड और नफ़रत का है माल
कहने को कुछ है नहीं, समझ न आये ख़ाक
कुंठा में नित खीझकर करता सिर्फ़ बवाल
संविधान ले हाथ में जिसका नहिं कुछ ज्ञान
चीख चीखकर कर रहा संसद बीच धमाल
रेंक रेंककर गधे सब झाड़ दुलत्ती खूब
घोड़ों की समता करें देखा यही कमाल
गरिमा संसद भवन की तार-तार कर रोज
उछल कूद ही कर रहा बार-डांसर-लाल
-- डॉ. विजय कुमार सिंघल,आगरा
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काव्य
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