काव्य :
बन गया तमाशा...
मैं हुआ निर्मित पृथ्वी की कोख से
अहम् नहीं जीवन की नोक़ से
हुआ विस्मृत इस जहाँ से
गर्व आ गया न जाने कहाँ से
जहाँ था लुप्त हो गया वहाँ से
है ये ज़िंदगी बेरहम,
एक तूफ़ाॅं भेद गया मुझको
गया मैं इतना सहम
कि जिसको चाहा स्वर्ण-पत्र सा
बन गया वो मृदा सा
जब मिला मैं मृदा में....
बन गया तमाशा....
- इन्द्राक्षी वाजपेई , प्रयागराज
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