काव्य :
मज़दूरों की आवाज़
भोर की पहली किरण संग,
उठ जाते हैं ये मज़दूर,
नींद अधूरी आँखों में लिए
फिर भी कदम रहते हैं भरपूर।
दो सूखे निवाले खाकर,
निकल पड़ते हैं राहों पर,
सपनों का बोझ उठाए हुए
जीवन के कठिन प्रवाहों पर।
तेज़ धूप की तपिश में भी
छाँव की चाह नहीं करते,
परिवार की भूखी आँखों के लिए
हर दर्द को सहन करते।
हाथों में असीम शक्ति लिए,
मन में अद्भुत अरमान,
ईंट-पत्थरों के बीच ही सिमटा
इनका सारा जहान।
अपनी ज़रूरतें सीमित रखकर
दूसरों के घर सजाते हैं,
खुद की झोपड़ी अधूरी रह जाए
फिर भी महल बनाते हैं।
जब कभी हक़ की बात उठाते,
अपनी आवाज़ सुनाना चाहते हैं,
तब ताकतवर हाथ मिलकर
मज़दूरों की आवाज़ दबाना चाहते हैं।
फिर भी हर दिन, हर सुबह
नई उम्मीद लेकर आते हैं,
ये मज़दूर ही हैं जो
दुनिया को आगे बढ़ाते हैं।
-श्रीमती अंजना दिलीप दास
बसना छत्तीसगढ़
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