लघु कथा :
मवाली
घनी बस्ती वाला एक मुहल्ला। हर एक स्तर के लोग जहाँ रहते थे.
सभी में आपसी मेलजोल था। एक दूसरे के यहाँ जाना आना था। दोपहर में महिलाओं की बैठकी लगती थी, गप्पेंबाजी होती थी। कढ़ाई-बुनाई का कार्यक्रम भी साथ-साथ चलता था।
इसमें मिसेज़ रमा भी भाग लिया करती थीं।
मिस्टर वर्मा अभी-अभी बनारस से तबादला हो कर लखनऊ आये हुए थे।वे सेल्स एंड मार्केटिंग का जॉब किसी अच्छे मल्टीनेशनल कम्पनी में काम करते थे। इस दंपत्ति को ईश्वर की कृपा से एक बेटा था जिस पर दोनों दंपत्ति प्यार लुटाते थे। मिसेज़ रमा डॉ के कहे अनुसार दोबारा माँ नहीं बन सकती थीं।
मिस्टर वर्मा अक्सर दौरे पर रहा करते थे। रमा अकेले बच्चे के साथ रहती थीं। इस मुहल्ले में मकान लेने के बाद वे काफ़ी आश्वस्त हो गई थीं कि पडोसी अच्छे हैं, आड़े समय उनसे मदद मिल सकती थी। यही सोच कर वर्मा जी की अनुपस्थिति में भी चैन की नींद सोती थीं।
एक साल ऐसे ही सुख से बीत गया। रमा ने कभी न सोचा था कि मिस्टर वर्मा के घर पर नहीं रहने के कारण इतनी परेशानियां झेलनी पड़ेगी। एक रात उसके बेटे को अचानक बहुत तेज बुखार आ गया। पेट दर्द और उल्टियां भी आ रही थी। बेटे की हालत देख रमा का घबड़ाना वाज़िब था. वह समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे। बाहर निकल कर देखा। कोई सवारी भी नहीं दिख रही थी। फ़िर उसने सोचा, फोन कॉल कर के देखती हूँ। उसने कई घरों में फ़ोन किया, लेकिन कहीं भी, किसी ने नहीं उठाया। फ़िर एक दो घरों में जा कर दरवाजा भी पीटा। किसी ने नहीं खोला। निराश हो कर लौट आई। शायद आधी रात वाली नींद बहुत गहरी होती है। फ़िर कोई उपाय न मिलने के बाद उसने पैदल ही बच्चे को हॉस्पिटल ले जाने के लिए बाहर निकल गई। घबराहट उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी। समझ नहीं पा रही थी क्या करे क्या ना करे?रात काफ़ी हो चुकी थी।
इस रात के अँधेरे में एक आकृति उसे अपनी ओर आते दिखी। ये मवाली था। जिसे देख मुहल्लेवासी आवारा,फालतू समझते थे, जो हर समय नुक्कड़ पर वाली चाय की दुकान पर मौजूद दीखता था। यद्दपि वह पढ़ने में भी ठीक-ठाक था। लोग उसकी मनोदशा नहीं समझते थे यूँ ही बिना जाने समझे बदनाम कर रखा था। ये जरूर था कि नुक्कड़ पर बैठने वाले लड़कों के साथ बैठने के कारण उसके प्रति लोगों की धारणा गलत हो गई थी।
वह रमा की परेशानी को ताड़ गया था। इसलिए वह रमा के पास आया और बोला -----"आप बहुत परेशान दिख रही हैं ऑन्टी? क्या बात है? बताइये मैं हेल्प कर दूँ।" डर से पहले तो रमा ने कहा -----"नहीं ---नहीं कुछ नहीं "
मवाली -----"निःसंकोच कहिये। आप जैसा समझ रही हैं वैसा मैं नहीं हूँ। अभी तो आप को इस बच्चे को बचाना है ना।
रमा ------"हाँ!कोई सवारी नहीं। पैदल ही गोद में उठा कर हॉस्पिटल ले जाने का सोच रही हूँ। "
मवाली ----"बस पांच मिनट में मैं किसी ऑटो वाले को पकड़ कर लाता हूँ। यूँ गया यूँ आया। "
कुछ ही देर में वह कहे अनुसार ऑटो रिक्शा ले आया।
बच्चे की नाजुक हालत देखते हुए उसने कहा -----"आप का अकेले जाना ठीक नहीं। अगर आपको ऐतराज न हो तो मैं आप के साथ चलूँ? "
पहले तो रमा हिचकिचाई। बाद में हामी भर दी।
हॉस्पिटल में डॉक्टर ने नाजुक स्थिति बता कर दो दिन के लिए एडमिट कर लिया। इन दो दिनों तक मवाली वहीँ डटा रहा। यहाँ तक कि बिल का पैमेंट भी कर दिया। डिस्चार्ज होने के बाद रमा और उसके बेटे को घर पहुंचा कर जाने की आज्ञा मांगी और कहा आगे से आंटी जब भी जरुरत हो मुझे याद करना. मैं हाजिर हो जाऊंगा.
रमा -----तुम्हारे इस एहसान का बदला मैं कैसे चुकाउंगी बेटा।
मवाली ---"इसमें एहसान की क्या बात है। मुह्हले में रह कर किसी के दुःख में काम न आऊँ, तो इससे बुरा और क्या हो सकता है। ईजाजत दीजिए कहता हुआ वह चला गया।
शाम को मिस्टर वर्मा दौरे पर से लौट आये। पिछले दो दिन में जो भी घटित हुआ रमा ने विस्तार से बताया। इस पर मिस्टर वर्मा ने मवाली को बुलाया और धन्यवाद दिया। जानना चाहा कौन है? लोग उसे बुरा क्यों समझते हैं?
वह आया। वर्मा जी ने पूछा तुम्हारा -----"तुम्हारा नाम क्या है?
मवाली ----"रजनीश "
वर्मा जी -----"पढ़ते हो "
मवाली ----"जी!ग्रेजुएशन कर रहा हूँ। "
वर्मा जी------"पढ़ते कम हो? नुक्कड़ पर समय गँवाते हो?इससे तुम्हारा नाम खराब हो रहा है? ऐसा मत करो? "
मवाली हँसते हुए -----"अंकल मैं जो अंदर से हूँ उसे कोई नहीं बदल सकता। आपने सुना होगा चन्दन के पेड़ पर सांप के लिपटने पर भी चन्दन पर असर नहीं पड़ता। दूसरी बात मैं बिलकुल अकेला हूँ. मेरे माता-पिता, भाई-बहन कोई नहीं है। ये तो पिता ने मेरे लिए रूपये-पैसै का इन्तजाम कर गये हैं, उससे गुजारा मेरा हो जाता है। अकेलापन दूर करने के लिऐ मैं चाय की दूकान पर बैठता हूँ। मेरे सभी दोस्त वैसे नहीं हैं जैसी लोगों ने धारणा बना ली है"
उसकी बातों को सुन कर वर्मा जी की आँखे भर आई. उन्होंने उसे गले से लगा लिया।
- डॉ मंजु लता , नोयेडा
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