ऐ ,सुबह तू जल्दी चली आना
उम्मीदों के शहर में
विश्वास का दीपक जलाना,
हटा देना तुम धुंध की चादर
ऐ, सुबह तू जल्दी चली आना||
भूल - भुलैया के इस जीवन में
कितने अंधेरे मोड़ है,
भटक रहा मैं इधर- उधर
अब ना तुम मुझको भटकाना,
ऐ, सुबह तू जल्दी चली आना ||
अंतरद्वंद की वेदना से
घुटने लगा है अब जीवन ,
टूट ना जाए सासों की लड़ियां
दर्द को मेरे तुम सहलाना ,
ऐ ,सुबह तू जल्दी चली आना||
बड़ा गहरा भंवर है
और कश्ती भी पुरानी है,
लहरे भी अपना खेल दिखाती
इन लहरों से तुम मुझे बचाना,
ऐ ,सुबह तू जल्दी चली आना||
तमन्ना थी कुछ कर गुजरने की
सुनी तस्वीर में रंग भरने की
खाली रह गया तकदीर का पन्ना ,
आके पन्नो पे कुछ लिख जाना
ऐ ,सुबह तू जल्दी चली आना ||
पके फसल पाएं कैसे
जब कच्चा ही बीज बोया था,
सारी हसरते जल गई मेरी
अधूरी हसरतों को पूरी कर जाना
ऐ,सुबह तू जल्दी चली आना||
आरजूओं का अंत नहीं
अब मेरे कोई संग नही,
नितांत सुना है मेरा आकाश
चांद तारों से तुम भर जाना ,
ऐ, सुबह तू जल्दी चली आना||
ओढ़ अभिलाषाओं की चादर
पंछी बन मैं उड़ चला ,
पर काटे है मेरे ही अपने
ना किसी को तुम बताना ,
ऐ, सुबह तू जल्दी चली आना||
-ऋतु दीक्षित , वाराणसी, उत्तर प्रदेश
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