ad

काव्य : पीत पात झड़ते हैं - रामनारायण सोनी,इंदौर


पीत पात झड़ते हैं


अभी अभी बीता है पतझड़

है कुछ मौन अभी बाकी

झरे गिरे से उन पातों की

अभी काल ने यादें ढाँकी


जो जगह पुराने पातों ने

पतझारों में कर दी खाली 

आज नियति ने घुमा चक्र

फिर से नव संसृति रच डाली


पल्लव अपना जीवन लेकर

शाखों पर जब उतरे थे

अपनी करनी के बलबूते

कुछ बिखरे कुछ निखरे थे


पादप के इक इक हिस्से को

अपना धर्म निभाना है

धरा धाम से जो जो पाया

धरा यहाँ रह जाना है


जब कोंपल शाखों में जन्मी

मधुमास बड़ा बौराया था

पीपल ने थी पीटी ताली 

झरनों ने मङ्गल गाया था


उत्स हुआ बन का आंगन

भ्रमरों ने वीथी घूम घूम

देखा पुष्पों को चुपके से

कलिका का माथा चूम चूम


उस पादप का रोआँ रोआँ

था कितना रोमांच भरा

मूलों ने भेजा अभिसिंचन 

था फूलों से मकरंद झरा


उन शाखों से लिपटी लिपटी

मृदु लतिका ने स्पर्श किया

अंकुर का नव अरुणाई से

फिर हौले से श्रृंगार किया


रजनी की शीतल अलकाएँ

शबनम की माला ले आई

फर फर करती चिरिया भी

फुनगी पर बैठी मुस्काई


अमलतास की वेणी लटकी 

केकी करती वृन्दगान

अमरबेल ले पीत वसन

बुन बुन कर ताना है वितान


जीवन के चक्र निराले हैं

कण कण है गतिमान यहाँ

बंजारे की बस्ती ठहरी

है आज यहाँ तो कल वहाँ


जब से यह धरती जन्मी है

काल बली कुछ रचता है

रोज बनाता रोज मिटाता

काल कभी ना मरता है


झर जाऊँगा मैं डाली से

जैसे झरते हैं पीत पात

इससे पहले भी आए हैं

कितने ढलते सांझ प्रात


पर सब के सब वे थे अपने 

कर्मों धर्मों से बँधे बँधे

नियति परिधि में नियमों की

निरत रहे सब सधे सधे 


फिर जीवन की संध्या आई

घूमा था जब वह कालचक्र 

श्वासों की माला टूट चली

थी दृष्टि काल की महावक्र


झरते पातों की तब खुद ही

शाखों से ममता छूट गई

वह साँझ रात की गोदी में

झीनी गागर सी टूट गई


आया पवन झकोरा तब वह

आँगन आँगन दिया बुहार

नियती नटी है कब चुप बैठी

फिर फिर उसने किया सिंगार


- रामनारायण सोनी,इंदौर

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

Post a Comment

Previous Post Next Post