आदमी
चाहतों के सामने आदमी झुक गया,
और उसका आदमी पन रुक गया।
भूल गया जहाँ में कि मैं कौन हूँ ?
बाहर के भँवर में एकदम घुस गया।
रूप, अरूप, राग, द्वेष में बँट गया,
अपने पराये के दलदल में धँस गया।
कहने को कहता रहा समाज सर्जक
सर्जन के नाम पर ध्वंस में फँस गया।
पैदा की हुई समस्याएँ जब डँसने लगीं
उसके ही वजूद पर जब वे हँसने लगीं
विमूढ मन उन्हींमें निज वजूद ढूंढ रहा
वजूद कहाँ, समस्याएँ ही बढने लगीं।
प्रतीकों को सच मानने लगा आदमी,
औरों को वैसे ही देखने लगा आदमी।
प्यार जताने को पालने लगा जानवर,
अब आदमी से घबड़ाने लगा आदमी।
- डॉ. सत्येंद्र सिंह पुणे, महाराष्ट्र
Tags:
काव्य
.jpg)
