ओ निष्ठुर मनुष्य !
ओ निष्ठुर मनुष्य! क्यों तू,
हरे-भरे वृक्षों को काटकर,
उनको टुकड़ों में बाँटता है।
सुनो ये वृक्ष भी तो रोते हैं,
इनको भी तो पीड़ा होती है।
ओ निष्ठुर मनुष्य ! क्यों तू,
हो गया इतना पत्थर-दिल?
इन वृक्षों से ही जहाँ में तू,
ऐ मानव जीवित रहता है।
सोचा भी है तूने ओ मनुष्य,
इन समस्त वृक्षों के बारे में।
ओ निष्ठुर मनुष्य ! बता मुझे
क्या मिलेगा तुझे काट इन्हें?
बता आखिर क्या बिगाड़ा है,
इन सभी हरे-भरे वृक्षों ने तेरा?
वक्त रहते त्रूटी अपनी सुधार ले,
वृक्षारोपण करके तू संकल्प ले।
ओ निष्ठुर मनुष्य ! ये वृक्ष तुझे,
जीने के लिए बहुत कुछ देते हैं।
यही सबके जीवन का स्रोत हैं,
तो क्यों उगाने की जगह इनको,
काट-काटकर तू नष्ट कर रहा है?
- सलमान सूर्य,बागपत
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काव्य
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