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काव्य : ओ निष्ठुर मनुष्य ! - सलमान सूर्य,बागपत


  ओ निष्ठुर मनुष्य !


ओ निष्ठुर मनुष्य! क्यों तू,

हरे-भरे वृक्षों को काटकर,

उनको टुकड़ों में बाँटता है।

सुनो ये वृक्ष भी तो रोते हैं, 

इनको भी तो पीड़ा होती है।


ओ निष्ठुर मनुष्य ! क्यों तू,

हो गया इतना पत्थर-दिल?

इन वृक्षों से ही जहाँ में तू,

ऐ मानव जीवित रहता है।

सोचा भी है तूने ओ मनुष्य,

इन समस्त वृक्षों के बारे में।


ओ निष्ठुर मनुष्य ! बता मुझे 

क्या मिलेगा तुझे काट इन्हें?

बता आखिर क्या बिगाड़ा है,

इन सभी हरे-भरे वृक्षों ने तेरा?

वक्त रहते त्रूटी अपनी सुधार ले,

वृक्षारोपण करके तू संकल्प ले।


ओ निष्ठुर मनुष्य ! ये वृक्ष तुझे, 

जीने के लिए बहुत कुछ देते हैं।

यही सबके जीवन का स्रोत हैं,

तो क्यों उगाने की जगह इनको,

काट-काटकर तू नष्ट कर रहा है?


- सलमान सूर्य,बागपत

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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