लकड़ी के चूल्हे
वो दिन दूर चले गए,
हम इतने खुशनसीब न रहे अब,
चूल्हे ,चौके बदल गए,
नही मिलती लकड़ी के चूल्हे पर सिकी,
मीठी , गरम रोटियां
मां ,भाभी या बहनों के हाथ की बनी,
हमने रोटी के साथ, रिश्तों की
गरमाहट और मिठास ,सब खो दीं
हम किसको जिम्मेदार कहें
समय को
या स्वयं को *ब्रज*
- डॉ ब्रजभूषण मिश्र , भोपाल
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काव्य
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