कविता
आशा का सूर्योदय
चीरकर अंधेरों को
निकला है सहरा,
रब का ये नूर है
या तेरा चेहरा?
जीवन में जब लगे
निराशा का पहरा,
सूझे डगर ना कोई
अंधकार गहरा।
डर की सलाखों से
तब झांकेगी आशा,
अंधेरे को भेदकर
आएगा सहरा!
- डॉ. सुधा कुमारी, नई दिल्ली
Tags:
काव्य
.jpg)
आशा का सूर्योदय
चीरकर अंधेरों को
निकला है सहरा,
रब का ये नूर है
या तेरा चेहरा?
जीवन में जब लगे
निराशा का पहरा,
सूझे डगर ना कोई
अंधकार गहरा।
डर की सलाखों से
तब झांकेगी आशा,
अंधेरे को भेदकर
आएगा सहरा!
- डॉ. सुधा कुमारी, नई दिल्ली