पाॅलीथीन मुक्त दिवस पर विशेष
व्यथा एक सी
कोने मे पड़ी पाॅलीथीन
जमीन पर पड़ी फूल माला
कराह रही थी दोनों
दर्द मुझसे देखा न गया
हाल उनके पूछने
गई मैं उनके पास
तुम दोनों क्यों हो उदास
पाॅलीथीन बोली
डालकर मुझमे माला
लाये थे लोग प्यार से
हो गया काम
फेंक दिया मुझे बेदर्दी से
ये भी न सोचा क्या होगा मेरा
जमीन मे जाऊंगी या पानी
या पैदा करूंगी मच्छर
किसी नाली मे
करूंगी बिमार सबको
काश मैं सहज सुलभ न होती
लोग मुझे यों बेदर्दी से न फेंकते
तभी फूल माला
बोली आंसु बहाते
बहन मेरे भी हाल तेरे जैसे
बड़े सम्मान से खरीदकर लाते
अदब से सम्भाल कर रखते
जब तक किसी के गले मे न पडूं
मुझे मुरझाने न देते
बस दो मिनिट रहती गले मे
फिर फेंक देते बेदर्दी से
पड़ी रहती आवारा की तरह
कुचली जाती पांव तले
कितने जीव मुझमे पलते
यह कोई नही सोचता
काश मैं मोती होती
अपना सम्मान यों न खोती
मैंने भी अपना दर्द जताया
तुमसे अलग नहीं हूँ मैं
देखती हूँ रोज उन्हे
पर्यावरण की बाते करते
लहराते हाथों मे पाॅलीथीन
उनकी कथनी और करनी
नहीं है एक सी
फिरकैसे मिले पाॅलीथीनसे मुक्ति ।
- चन्दा डांगी रेकी ग्रैंडमास्टर
( स्पिक मेके कॉर्डिनेटर )
मंदसौर मध्यप्रदेश
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