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समीक्षा : पिता को समर्पित एक पुत्री के हृदय का उदगार है "जीवन- दर्पण :एक युग एक यात्रा" -डॉ मीनाक्षी कर्ण. जमशेदपुर


समीक्षा

पिता को समर्पित एक पुत्री के हृदय का उदगार है "जीवन- दर्पण :एक युग एक यात्रा"

 पिता को समर्पित एक पुत्री के हृदय का उदगार है "जीवन- दर्पण :एक युग एक यात्रा"। एक पुत्री  के द्वारा अपने पिता के लिए इससे बड़ी सच्ची श्रद्धांजलि नहीं हो सकती जिसमें पूरे जीवन को एक दर्पण की तरह पारदर्शी रूप में प्रस्तुत किया है।

 पुस्तक का शीर्षक भी बहुत ही गंभीर और अर्थपूर्ण लिए हुए हैं।

 एक व्यक्ति अपने जीवन में पथिक होता है और उसकी यात्रा मरणोपरांत ही रुकती है।

 पदमा जी का अपने पिता के प्रति जो स्नेह और समर्पण है उनके इन पंक्तियों से स्पष्ट झलकता है-

" यह तुम्हारा स्नेह ही तो था,

 जो संघर्षों के जंगल में,

 किसी बासंती बयार की तरह,

 सहलाता रहा मेरे शूल चुभे पाँवो को"

  डॉ. मणिन्द्रनाथ पांडे जी अद्भुत व्यक्तित्व के धनी थे। उनके त्याग, अध्ययन प्रियता एवं अध्यापन के अनुशासन प्रिय विशिष्ट शैली का प्रभाव उनकी संतानों पर दिखता है। उनका अध्ययन के प्रति गहरी रुचि इसी से पता चलता है कि उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से एम. ए.,पी.एच.डी.,पटना विश्वविद्यालय से डि.लिट.की उपाधि प्राप्त की एवं विभागाध्यक्ष के रूप में विभिन्न विद्यालय एवं विश्वविद्यालयों में अध्यापन का कार्य किया। प्राचार्य के रूप में कुमाऊं विश्वविद्यालय अल्मोड़ा से अवकाश प्राप्त किया।

 साहित्य के प्रति उनकी गहरी रुचि थी एवं उनका सृजन अनवरत चलता रहा। इनके गुरु आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, आचार्य विश्वनाथ मिश्र, देवेंद्र नाथ शर्मा रहे हैं, जिनकी स्पष्ट छाप उनके व्यक्तित्व में दिखाई पड़ती है।

डॉ. पांडेय जी की रचनाएं अपने परिवेश,परिस्थितियों की उपज है, हृदय की अंतर्वेदना एवं उल्लास की अभिव्यक्ति है।

 "जीवन दर्पण रचना संसार" में वो मां शारदे से याचना करते हैं कि तुम्हारी कृपा से ही कालिदास और बाल्मीकि महान कवि बन जाते हैं जो तुम्हारे चरणों में जाता है साधक सफल सिद्ध हो जाता है।

"सन बयालिस की क्रांति "में गांधी जी के आवाहन पर भारत के युवा वर्ग आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। विद्यालय एवं विश्वविद्यालय के छात्र छात्राएं वंदिनी भारत मां को आजाद करने के लिए कृत संकल्प हो उठे थे। युवाओं के ओज और जोश को देख ब्रिटिश राज्य काँप उठे।युवा  देश की आजादी के लिए सारी सीमाओं को तोड़ अपने भविष्य जीवन,मृत्यु की चिंताओं से मुक्त गांधी जी के आह्वान पर निकल पड़े थे।

" नव वर्ष मंगलमय हो में "उन्होंने व्यंग्य किया है जो देश के ठेकेदारों समाज सेवियों पर है, जो केवल अपना हित साधते हैं और जरूरतमंदों को नहीं देते हैं।

"शिक्षा" कविता में एक अध्यापक होने के नाते पांडेय जी शिक्षा के महत्व से भलि- भांति परिचित थे। शिक्षा शिक्षक के द्वारा ही शिष्यों के माध्यम से अलख जागती है। वह कहते हैं कि शिक्षा केवल ग्रंथों एवं अक्षर का ज्ञान कराने वाला या संपादन के प्रचार -प्रसार तक ही सीमित नहीं है यह अनुभव का बीज मंत्र है,जो जीवन में फलीभूत होता है। यह आत्मा से परिचय कराती है इस आत्म ज्ञान से मानव की जड़ता समाप्त होती है। संस्कार को जन्म देती है,जिससे अंतस् के अंधकार को मिटाकर प्रकाश की ओर ले जाता है। यह शिक्षा एक गुरु के माध्यम से मिल सकती है।

जैसे एक कुम्हार एक अनगढ़े माटी को अपने हाथों में लेकर बड़े स्नेह भाव से उसे विभिन्न रूपों में ढालता है, इस तरह शिक्षक एक अनगढ़ शिष्य को अपने ज्ञान,स्नेहा, अभिलाषाओं के माध्यम से विभिन्न तरह से गढ़ती है। उसे संस्कारवान बनती है। एक गुरु ही ज्ञान एवं संसार का बोध कराता है।

" अंगार गीत" में कवियों को संबोधित करते हुए कहते हैं कि अभी तक तुमने श्रृंगार के ही गीत गाये है। प्रिया मिलन और प्रणय के अभिनंदन  ही गाये है, इन गीतों से बाहर निकल कर अंगारों के गीत तुम्हें अब गाना है। देश को भ्रष्टाचारों एवं झंझावतों से बाहर निकलना है।

"जय जवान जय किसान" में उन्होंने किसानों एवं जवानों में हुंकार भरते हुए कहते हैं कि उठो जवान सिंह के समान गर्जना करो देश तुम्हे पुकारता है, उठो किसान नवीन सर्जना करो खेत और सिवान पर पुकार रहे है जन सभी।

 "कारगिल विजय दिवस" कविता में कवि कारगिल पर विजय प्राप्त करने के पश्चात भारत के वीरों के पराक्रम और शौर्य की गाथा गाते हैं। यह विजय प्रत्येक भारतवासियों को गर्वित करता है।  सेना के प्रति सम्मान भाव से शीश झुक जाते हैं। पाक के गलत मंसूबे को उत्तर देने के लिए और आतंकवादियों से देश को मुक्त करने के लिए हमारे देश के सैनिकों ने अपनी जान की बाजी लगा दी थी, हमें अपने  देश के वीरों पर गर्व है।

 आजादी की लड़ाई में युवाओं एवं देशवासियों को पांडे जी अपने कलाम के माध्यम से आवाहन करते हैं।देश की दुर्दशा से कवि का हृदय विदिर्ण हो उठता है। वह अनेकों माध्यम से जन-जन को जागृत करते है। उनकी कविताएं देश प्रेम की भावना से ओत प्रोत है। यह देश की आजादी की लड़ाई में कलम को हथियार बना कर देशवासियो,युवाओं एवं सैनिकों में जोश और उत्साह से भर देते हैं।

कविता का जन्म कवियों के ह्रदय में किस तरह से होता है, उसका भी डॉ. पाण्डेय जी ने बहुत सुन्दर ढंग से अपनी कविता "कविता का जन्म वहीं होता है " में किया है। भावों के उन्मुक्त गगन में जब पीड़ा के बादल घिर आते है, सदियों के पवन झकोरा से वे सहज़ बरसने आ जाते है, कविता का जन्म वहीं होता है।

"शिक्षक सर्वहारा है " में उन्होंने शिक्षक की दयनीय अवस्था का बहुत ही मार्मिक चित्रण किया है। एक शिक्षक जो शिक्षा का अलख जागते है,समाज को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते है देश के उज्जवल भविष्य का निर्माण करते है परन्तु वहीं दीन- हीन उपेक्षित है -

                 "शिक्षक सर्वहारा है 

                शिक्षक सर्वहारा है 

         सदियों से दीन हीन, शिक्षा का भर लिए

     आदर्श के जंगल में ढूंढता सहारा है

       शिक्षक सर्वहारा है।"

 "कर्मवीर "कविता में कहते है कि कर्मवीर वहीं होता है जो त्याग, तपस्या से जीवन पथ नवनिर्मित करते है। जीवन में कभी हार नहीं मानते।

" आओ मिलकर दीप जलाएं" कविता में सभी का आवाहन करते हुए कहते हैं कि आओ मिलकर दीप जलाएं घर आंगन से चौबारे तक,  जन जन में अँधियारा छाया हुआ है, पथ नहीं दिखायी दे रहा।

" यह भारत का पानी है" कविता में भारत की दुर्दशा को देख व्यथित कवि अपने इष्ट श्री कृष्ण को हृदय से स्मरण कर उनका आह्वान कर रहे हैं।  वह कहते हैं- आओ हे कृष्ण देश तुम्हारा इंतजार कर रहा है। चारों ओर आसुरी वृत्तियाँ बढ़ रही है और देव वृत्तियों का नाश हो रहा है।हे कृष्णा कब तक कंस की कार में देवकी वासुदेव कैद रहेंगे, कब तक अत्याचार सहेंगे, तुम्हारी गोकुल नगरी राजा के अत्याचार से पीड़ित है।

 हे कान्हा जहाँ तुम्हारी लीला भूमि थी, जहाँ तुमने बाल क्रियाएं की थी, वह यमुना तट सभी कहीं खो गए हैं। तुम मथुरा छोड़े,पलायित हुए द्वारका नगरी से फिर भी चुनौतियां कम नहीं हुई उन चुनौतियों से तुम्हें मुक्ति नहीं मिली।

 एक सहृदय व्यक्ति का हृदय अपने आस-पास,वातावरण, परिवेश के प्रति भी सजग होता है। प्रकृति और वातावरण में मानवीय हस्तक्षेप से हृदय व्यथित हो उठता है। "गंगा उदास है" कविता में गंगा के स्वच्छ,निर्मल,पावन जल के मानव द्वारा दूषित करने से उसके पावनता को नष्ट करने से दुखी है और वह कहते हैं कि आज गंगा उदास है। जी गंगा के शीतल जल में नील गगन झांकता थी उसे देखकर उनका तन मन व्याकुल हो रहा है, नयन भींग रहे हैं। उसकी पावनता, निर्मलता,चंचलता,झिलमिल सी उज्ज्वलता मानवों के भूलों के कारण दूषित हो रही है। जो शिव की जटाओं से निकल धरती पर लहराती है, जन-जन की जीवनदायिनी स्नेह, सुधा, शीतलता बाटती है, वह आज मानव की कुत्सित आशाओं की भेंट चढ़ गयी।गंगा मां अपनी संतानों से पराजित हो गयी वह मानवों की कृत्यों से उदास है,गंगा उदास है।

 कवि को प्रकृति से प्रगाढ़ प्रेम था।उनके काव्यों में प्रकृति के प्रति आगाध प्रेम प्रकट होता है और प्रकृति के संरक्षण के प्रति वह सजग भी हैं।प्रकृति को समर्पित उनकी अनेकों कविताएं हैं। "आओ घर- घर बाग लगाये" कविता में  सभी का आह्वान करते हुए कहते हैं कि आओ घर-घर बाग लगाये।पेड़ लगाकर पूरी धरती को सजा दे। बसंत जो हमसे रूठ कर चला गया है उसे फिर से मनाये और धरती को स्वर्ग बनाये,भारत को स्वच्छ बनाये। सरित,सरोवर,सागर तट,ताल- तलैया,कुंड सभी नवजीवन का संदेश देते हैं। धरती पर बढ़ते प्रदूषण से गगन, वायु, धरा और वारि को मुक्त करने का आवाहन करते हैं। घर-घर बाग लगाकर चारों ओर हरियाली फैलाकर प्रदूषण को स्वच्छ करने का संदेश देते हैं।

 प्रकृति के प्रति भी अद्भुत प्रेम इनकी कविताओं में दिखालयी पड़ता है,-"खेतों  और खलिहनों तक", , यह हिमालय है, आदि कविताये, इनकी गहन प्रकृति प्रेम को दर्शाती है।

"मृत्यु के द्वार से " कविता में जीवन के अटल यथार्थ को ,कटु सत्य को चित्रित करते है।

"जब बेटी माँ बन जाती है " इस कविता में तो डॉ. पाण्डेय जी की ह्रदय की कोमलता,सहृदयता, और नारी के प्रति प्रेम,आदर का भाव परिलक्षित होता है। इस कविता में अपनी पुत्री के प्रति अगाध प्रेम, और ममता दिखालाई पडती है। अपनी पुत्री के सेवा  से भाव विह्वल हो उठते है और पुनर्जन्म में माँ रूप में पाना चाहते है।

उनका बेटियों के प्रति प्रेम उनकी कविता में स्पष्ट रूप से दिखयी पड़ता है।" बेटी की विदाई "कविता में एक पिता का बेटी को विदा करते समय  ह्रदय की वेदना अश्रु बनकर बरसते है। बेटी के जाने के बाद जों घर आँगन सूना सूना लगता है उसका यथार्थ चित्रण किया है।

डॉ. पाण्डेय जी ने अपने चौरासिवें जन्मदिन पर लिखी कविता "मेरा जन्मदिन "में अपने पूरे जीवन की व्यथा -कथा को चित्रित किया है।

उन्होंने "आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को समर्पित", "आचार्य विश्वनाथ के प्रति" कविता में  अपने गुरुओं के प्रति अपार स्नेह एवं समर्पण को अभिव्यक्त किया है।

 इन कविताओं के अतिरिक्त शिक्षा, गणतंत्र तुम्हारा अभिनंदन, तुम भारत के सैनिक हो, गंगा तेरा निर्मल कछार, आलोक पर्व, हंस वाहिनी वीणाधारिणी, , मैं सागर की एक लहर हूं, आजादी का विजय पर्व है, श्री कृष्ण जन्माष्टमी, क्या आजादी का दीप, मना रहे सद्भावना दिवस, सूर्य षष्ठी, मां तेरे जीवन की कथा, तुम अंतर का विमल प्रकाश प्रिये, साथी हिम्मत नहीं हारना,आजादी का आवाहन, यह भारत की हिंदी है, माटी का तन माटी का दीपक, जीवन की सांझ, आदि कविताओं में उनकी बहू प्रतिभा, विविध  विषयो पर अच्छी पकड़ उनके ज्ञान के भंडार को परिलक्षित करती है।

पद्मा जी ने जिस मनोयोग से , स्नेह से एवं पिता के प्रति समर्पण भाव से इस पुस्तक को प्रकाशित किया है, वो अद्वितीय है।

पिताजी के मृत्युलोक को प्राप्त करने के बाद पद्मा जी का जीवन शून्यता से भर गया।एक विशाल वटवृक्ष जिसके छांव में बचपन, युवा अवस्था व्यतीत हुआ, जहाँ सपनों का आसमान गढ़ा गया, इंद्रधनुषी कल्पना रंग भारती थी धाराशयी हो गयी। बहुत मुश्किलो के बाद अपने आपको संभाल पायी। अपनी शक्ति और ऊर्जा को फिर से एकत्रित कर उन्होंने अपने पिता को एक सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की।,,    .

- डॉ मीनाक्षी कर्ण. जमशेदपुर



देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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