काव्य :
मंदसौर: कवि दिवस पर विशेष 🚩
( साल में एक दिन कवियों के नाम भी है । राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त के जन्मदिन को समर्पित इस दिवस पर कवि ह्रदय से निकली कविता के वर्तमान पर यह रचना जो मन मस्तिष्क को झकझोरेगी )
एक कविता कवियों के नाम
जानकर हुई खुशी कि कवि का अपना भी होता है एक दिन
लेकिन हालत कवियों की लगाती है इस पर प्रश्न चिन्ह
जिस कवि को माना जाता था सबसे बड़ा कल्पनाकार
था अव्वल विधाता जैसी मौलिकता गढ़ने में आकार
शास्त्रकारों की नजरों में था जिसके समकक्ष सिर्फ रवि
याद है वह कहावत जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि
जिस परंपरा के रहे वाहक पद्माकर सेनापति भूषण
प्रसाद पंत निराला महादेवी रहे सदा जिसके आभूषण
दिनकर सुमन बच्चन जैसे रत्नों ने जिसे आगे बढ़ाया
अज्ञेय मुक्तिबोध दुष्यंत आदि ने जो परचम लहराया
देखते ही देखते क्यों धूमिल हो गई वह काव्य परंपरा
क्यों आज दिखता नहीं किसी कवि का कोई टपरा
कवियों की इस बदहाली के लिए खुद कवि है जिम्मेदार
प्रचार पिपासु कलम घिस्सुओं की कलम में रही नहीं धार
कविता न शब्दों की बंदिश है ना युग्मों का ताना-बाना
संवेदना की भट्टी में तप कर युगधर्म पड़ता है निभाना
बिना करुणा - वेदना कैसी कविता किसकी कविता
भीतर जलती है अनेक चिता तब जन्मती है एक कविता
एक क्रौंच पक्षी का वध रचवा सकता है जब रामायण
तो लाशों के ढेर पर बैठे कलयुग में होता नित पारायण
लेकिन अब न वैसी दृष्टि रही ना रहा वैसा दृष्टिकोण
सफलता की पतली गली में हर सर्जक तलाश रहा समकोण
बिन तपे न स्वर्ण कुंदन बनता ना मिलते भगवान
अंतर्मन की निर्मलता है जरूरी बनने से पहले विद्वान
हर तीसरा व्यक्ति कवि बन जाए नहीं कवि कर्म इतना आसान
है यह उतना ही जोखिम भरा जगाना होता जितना मसान
भारत भारती जैसा महाकाव्य रचने वाले ही कवि कहलाते हैं
ऐसी उत्कृष्ट साधना के जन्मदिन ही कवि दिवस बन पाते हैं
इन जैसा एक कतरा भी रच पाए तो धन्य जीवन हमारा
नतमस्तक हैं उनको जिन्होंने धरा का काव्य पथ है संवारा
💥 डॉ देवेंद्र जोशी
कवि लेखक चिंतक उज्जैन
प्रस्तुति - डॉ घनश्याम बटवाल मंदसौर
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