व्यंग्य :
नारी सम्मान
'वीमन्स डे' नाम का ग्लोबल उत्सव हमारे यहाँ भी निर्विघ्न सम्पन्न हुआ । ना तो किसीने इसे पाश्चिमी गोरों का त्योहार कह कर अपनी उजरदारी जताई और ना ही यह दावा किया कि हम तो सनातन काल से ही 'देवी और कन्या पूजन' के नाम से महिलाओं को पूजते आए हैं। हम देवी की पूजा शक्तिरूप में करते हैं इसलिये महिला सशक्तीकरण के मामले में हम विश्व में अग्रणी है । सरकार भी देश की लाड़ली नारियों- बेटियों पर हर महीने नकद रकम न्योछावर करती है। महिला दिवस पर संसद में महिलाओं को बोलने का प्रस्ताव लाकर उसे नारी सम्मान का नाम भी देती है। होटल रेस्तराँ वाले भी इस दिन उनके बिल में रियायत देकर प्रचार की गंगा में अपने हाथ धो लेते हैं। गोष्ठियों-सम्मेलनों में बुद्धिजीवी लोग नारी सशक्तीकरण पर बुद्धि-विलास कर लेते हैं। नारीवादी संस्थाएं भी नारियों की कीर्तिगाथा गाकर पुरुषनिंदा का आनन्द ले लेतीं हैं। स्कूली बच्चे बालसभाओं में 'यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता' का आलाप करते हैं ,अखबार वाले हर रोज की तरह बलात्कार, यौन शोषण व प्रताड़ना की खबरें छापते हैं और पुरुष वर्ग उन खबरों को चटखारे लेकर पढ़ता है।
सरकार बेचारी अपने दोनो हाथों में धर्मदण्ड थामे हुई थी नहीं तो 'निर्भया' पर जलाईं गई हजारों मोमबत्तियों की लौ, पहलवान लड़कियों के यौन शोषण के खिलाफ प्रोटेस्ट पर बुझ नहीं पाती, मणिपुर में निर्वस्त्र घुमाई गई नारी पर नारीवादियों के सुर गले में अटक कर नहीं रह जाते, कुलदीपों को जमानत नहीं मिल पाती, राष्ट्रवाद के नाम पर बलात्कारियों की सजा माफ नहीं हो पाती, बलात्कारी बाबा को जेल से मनमानी छुट्टियों का लुत्फ भी नहीं मिलता, बिगड़ैल नवाबजादों की अैय्याशियों के आगोश में 'अंकिताओं' के कत्ल भी नहीं होते, अभागी शोषितों के परिजनों को कोर्ट की दीवारों से सिर भी नहीं मारना पड़ता, आरोपी रसूखदारों की चुनावी जीत पर सरकार के जश्न भी नहीं हो पाते और मोमबत्तीबाज समाज द्वारा दिनदहाड़े सड़क किनारे किसी विक्षिप्ता के साथ होते बलात्कार का वीडियो भी नहीं बन पाता और,,, और,,, साल-दो साल की नन्ही 'औरत' से लेकर सत्तर पार की वृद्धाओं का कामपिपासु मर्दों की हैवानियत की भेंट चढ़ना भी सम्भव न हो पाता।
जयशंकर प्रसाद ने लिखा 'नारी तुम केवल श्रद्धा हो'- हाँ! स्वच्छ सार्वजनिक टॉयलेट के अभाव में घंटों तक पेशाब रोके महिला श्रद्धा की पात्र ही तो है लेकिन सिर्फ श्रद्धा और कुछ नहीं। 'नारी शक्ति-नारी सृष्टि' का सूक्त वाक्य बेनरों-पोस्टरों को आकर्षक बनाने भर के लिये है ; भला किसी मूर्ख अबला को शक्ति का दर्जा कैसे दिया जा सकता है ? औरत ही तो तमाम झगड़ों- झंझटों की जड़ है, उसे सृष्टि कैसे मान लें ? वह तो बच्चे पैदा करने की मशीन है ,उस अपवित्र भोग्या को श्रद्धा क्यों अर्पित करें ? स्त्री नर्क का द्वार है, ऐसी प्रलोभिका को अपने ब्रम्हचारी देवमूर्ति के मंदिर में प्रवेश क्यों दे दें? कहीं किसी श्रद्धावनत स्त्री के कारण देवमूर्ति का ब्रम्हचर्य कमजोर न पड़ जाये। पुरुष की अग्निपरीक्षा की लेबोरेटरी का निर्माण ही नहीं किया गया यह सुविधा सिर्फ सीताओं के लिये है।
दूसरी तरफ नारीवादियों नें 'जेण्डर इक्वेलिटी' का एक अलग बखेडा खड़ा कर रखा है, वे औरतों को मर्दों के बर्चस्व से आजादी दिलाना चाहते हैं। वे कहते हैं कि बच्चे पालने की जिम्मेवारी अकेली महिला पर क्यों हो; मर्द भी हाथ बटाएं। मर्द अपना बचाव करते हैं कि भला किसी ने शेर को अपने छौनों की जिम्मेवारी उठाते हुए देखा है ? उसकी शेर्दानगी इसमें है कि वह शेरनी की कोख हरी-भरी बनाए रखे फिर जो बच्चे जने उन्हे पालने खिलाने का काम भी उसीका। कभी किसी चिड़वे को अपने चूजों को चुग्गा चुगाते देखा है? पुरुष नें शिव का अनुसरण किया। शिव स्वयं पुरुष हैं, वे अकर्ता हैं, स्वयं कुछ नहीं करते; स्त्री शक्ति है, वह कर्ता है- संकल्प सिद्धि का काम उसी का है। पुरुष का पुरुषार्थ ही यही है कि वह 'अकर्ता' बना रहे कुछ नहीं करे। अपनी दुनियाँ को सम्हालने का काम भी स्त्री का है।
फिर भी अकर्ता मर्द अपना पुरुषार्थ छोड़कर सफर में बीबियों की दर्जनों ड्रेसों से भरे भारी भरकम सूटकेसों को ढ़ोता है, भीड़ में उनके लिये सीट जुगाड़ता हैं और खुद खड़े होकर सफर काटता हैं। स्त्री के प्रेम में वह अपनी मर्दानगी की पगड़ी उतार कर उनके पाँव भी दाब देता है- बस इस सीक्रेट को उजागर नहीं करता, मूँछ की इज्जत जो रखना है। मर्द बाहर से पेट भरने का जुगाड़ करता है तो बदले में अन्नपूर्णा से चार सिंके हुए फुलकों की उम्मीद भी न करे ? ये तो नाइंसाफी है। इसके बावजूद भी ये नारीवादी औरतों को मर्दों के बर्चस्व से आजादी दिलाना चाहते हैं। स्त्री से पूछो तो कि किससे आजादी चाहिये? पुरुष पिता की परिवरिश से ? भैया के भरोसे से ? बेटे की देखभाल से ? या मर्द पति के मधुर साहचर्य से? अब तक का तजुर्बा तो यही है कि पति ही वह पुरुष है जिसका वर्चस्व उसे मंजूर नहीं। पति की लगाम काबू में आ जाए तो बस मजे ही मजे हैं। वैसे भी घर में बर्चस्व तो औरतों का ही है, वह हिदायत देती है - 'आज शुक्रवार है खटाई नईं खाइयो' और आज्ञाकारी आदमी अचार-चटनी को हाथ भी नहीं लगाता। औरत का गुरुवार का व्रत, आदमी की उसके दोस्तों के साथ की नॉनवेज पार्टी के प्लान पर पानी फेर देता है। फिर भी औरतों को पुरुष से बराबरी चाहिये। पुरुष कहता है- वाह देवियो वाह! हम्ही से सीखीं अदाएं, हम्हीं पर वार किया,,,, जब ईश्वर नें ही हमें गैरबराबर बनाया है तो दोनो मे बराबरी भला कैसे हो सकती है ? कुदरत ने दोनो को अलग काया दी है, स्त्री को कोख दी, छाती में रस, ह्रदय में करुणा दी तो औरत करुणा लुटाए ना। पुरुष को मसल्स दिये, बल दिया तो बलवान मर्द अपना प्रभुत्व भी न दिखाए।हमारी बिल्ली हम्ही से म्याऊँ,,,,, दो बर्तन साथ होंगे तो खट-खट तो करेंगे ही? दो विपरीत मन जब एक ही भूमिका में आएंगे तो द्वंद तो होगा।
वूमन एम्पावरमेंट के लिये बस दो चीजें चाहिये- एक समान मौके और नारी सम्मान और इस मुहीम की रनवे पर महिलाओं की उड़ानें चालू हो चुकीं हैं लेकिन वूमन एम्पावरमेंट के रैम्प पर हाई हील पहन कर और कास्मेटिक सर्जरी की तकलीफदेह प्रक्रिया से गुजर कर कैटवॉक करने से उड़ान का थ्रस्ट तो मिलने से रहा बल्कि स्त्री को एक एन्ज्यॉयेबिल- कन्ज्यूमेबिल प्रोडक्ट के शो पीस में स्थिर होकर रह जाने का अंदेशा जरूर दे गया । मनोवैज्ञानिकों नें मर्दों को यहाँ भी नहीं बख्शा और इसे 'सिम्बोलिक वायलेंस' कह कर मर्दों के मत्थे जड़ दिया।
मर्द बेचारो, हाय तुम्हारी यही कहानी;
चेहरे पर है मूँछ, नजर में शीला की जवानी !!!!
कुदरत नें मर्द की आँखों में कामुकता का ऐसा स्कैनर फिट कर दिया है जिसकी बैटरी कभी लो नहीं होती। जिस वासना को शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती, जल भिगो नहीं सकता, और हवा सुखा नहीं सकती तो सरकारी कानूनों के पोथन्ने भला उसका क्या उखाड़ पाएंगे। इन पोथन्नो से सरकार औरतों की सुरक्षा की खुशफहमी भर दे सकती है, गारन्टी नहीं। औरत कितनी भी ऊँचाई पा ले पर उसकी कोमल काया पर मर्द की हैवानियत का जोखिम बना ही रहेगा।
- शारदा दयाल श्रीवास्तव
अयोध्या बाई पास, भोपाल
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