लघुकथा :
प्रसाद
डॉक्टर ने जैसे ही दरवाजा खोला,सरिता तेजी से उनके पास आई ।
मेरी बहू और बच्चा ?
दोनों बिल्कुल स्वस्थ है लेकिन मुझे आप लोगों से कुछ बात करनी है अभी हमने दोनों को अपनी निगरानी में रखा हुआ है । कुछ वक्त के लिए । कहती हुई डाक्टर सविता अपने केविन की तरफ चली गई ।
आप लोग परेशान मत हो दोनों को देख सकते हैं लेकिन अभी बातचीत न करें , ठीक है। कहती हुई नर्स चली गई।
ये सब क्या है पंकज बेटा सरिता देवी परेशानी से बोली !
डाक्टर ने बोला है न मां, थोड़ी देर की बात है और इतने साल गुजरे तो कुछ घंटे और सही । कितना प्यारा है न , कहता पंकज बच्चे को देखता रहा।
बेचारी अलका कितने साल की तपस्या अब पूरी हुई अभी सरिता देवी बोली ही थी कि सामने से नर्स आई
आप दोनों को मैम ने केविन में बुलाया है
नर्स के पीछे पीछे ही दोनों चल दिए
आप बैठें और मेरी बात बहुत ध्यान से सुनिएगा घबराने वाली बात नहीं है । मां बच्चा दोनों स्वस्थ है। लेकिन मैं जो बताने जा रही हूं पहले उसकी वजह से हमारे हास्पिटल में बहुत हंगामा हो चुका है।
आप दोनों से मैं गुजारिश करुंगी
पर बात क्या है डाक्टरनी जी पंकज थोड़ा खीजते हुए बोला -
आपका बच्चा न तो मेल है न फीमेल !
कैसी बात कर रही है आप !
क्या बोल रही हो डाक्टरनी जी । हे भगवान अब हम क्या करेंगे वरसो की तपस्या का ये फल ।
कहती सरिता देवी चीखने और रोने लगी और पंकज एकदम चुप।
हे शिव शंकर ये क्या हुआ क्या मेरे बेटे का वंश खत्म हो जाएगा सरिता देवी विलाप करने लगी।
देखिए , आप लोग थोड़ा धैर्य से काम लीजिए । डाक्टर को भी समझ नहीं आ रहा कि ऐसी स्थिति में क्या बोले ।
पंकज बेटा सरिता देवी ने कहा - हम अलका को ले चलते हैं घर बोल देंगे बच्चा नहीं रहा ।
ये क्या बोल रही मां आप मैं अपने बच्चे को अपने साथ रखूंगा वो मेरे भोलेनाथ का प्रसाद है।
डाक्टर सविता अपनी कुर्सी से ऐसे उठ खड़ी हुई जैसे वो भी इस प्रसाद का रसास्वाद कर रही हैं।
- डॉ शबनम सुल्ताना , भोपाल
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