नीट रद्द - बनाम युवाओं के जीवित सपनों की हत्या
- डॉ हंसा कमलेश नर्मदापुरम
किसी राष्ट्र को यदि भीतर से तोड़ना हो, तो उसकी सीमाओं पर युद्ध छेड़ना आवश्यक नहीं। उसकी युवा पीढ़ी के विश्वास को तोड़ दीजिए, उसके श्रम साध्य साधना का उपहास बना दीजिए, उसकी प्रतिभा को व्यवस्था की भ्रष्ट सुरंगों में भटका दीजिए , उसके जीवित सपनों की हत्या कर दिजिए— राष्ट्र स्वयं भीतर से खोखला होने लगेगा।
नीट रद्द कहने को केवल दो वाक्य हैं पर यथार्थ में यह केवल 22 लाख परिक्षार्थियों के जीवित लक्ष्य भरे सपनों की हत्या नहीं बल्कि उन विद्यार्थियों के लिए भी गंभीर नासूर है जो पिछले तीन सालों से तैयारी कर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों से परिक्षाओं को रद्द कर देना, प्रतियोगी परीक्षाओं के परिणामों पर रोक एक रिवाज सा बन गया है। किशोरावस्था के बच्चों के साथ यह अन्याय क्रूरतम अपराध है। सच तो यह है कि यह जानबूझकर किया गया वो अपराध है जो किसी आंतकवादी घटना से कम नहीं। उन बच्चों की श्रम साध्य साधना का मजाक कब तक ? उनकी आंखों से निकलने वाले खून के आंसू की कीमत केवल फीस माफ करना नहीं है।
संविधान में जानबूझकर किया गया वो अपराध जो हत्या के समकक्ष है उसके लिए की गई सजा का प्रावधान क्या केवल एक इबारत है ?
जिस देश में एक किशोर तीन-तीन वर्षों तक स्वयं को कमरे की चार दीवारों में कैद कर देता है; जहाँ माँ अपने गहने बेचकर कोचिंग की फीस भरती है; पिता अपनी वृद्धावस्था की बचत बच्चे की पुस्तकों पर खर्च कर देता है; जहाँ एक विद्यार्थी त्योहार, मित्रता, खेल, नींद और मानसिक शांति तक त्याग देता है — वहाँ परीक्षा रद्द होना केवल “री-एग्जाम” नहीं होता, वह पूरे परिवार की सामूहिक तपस्या की हत्या है।
सबसे भयावह पक्ष यह है कि अब यह अपवाद नहीं रहा। प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली, पेपर लीक, परिणामों पर रोक, तकनीकी विसंगतियाँ — सब धीरे-धीरे सामान्य समाचार बनते जा रहे हैं। यह सामान्यीकरण ही सबसे बड़ा खतरा है। जब अन्याय लगातार घटित होने लगे और समाज उसकी आदत डाल ले, तब समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था संवेदनहीनता के चरम पर पहुँच चुकी है।
आखिर देश के युवा कब तक सहन करेंगे ? विभिन्न चैनलों के माध्यम से निराश न हों विद्यार्थियों को दिया जाने वाला सन्देश क्या सचमुच सार्थक हैं ? व्यवस्था की क्रूरता केवल भ्रष्टाचार में नहीं, बल्कि उसकी संवेदनहीन भाषा में भी दिखाई देती है। परीक्षा रद्द होने के बाद वही घिसे-पिटे वाक्य दोहराए जाते हैं — “विद्यार्थी निराश न हों”, “सरकार उनके साथ है”, “दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।” किंतु प्रश्न यह है कि क्या इन खोखले आश्वासनों से उन रातों की भरपाई हो सकती है, जो विद्यार्थियों ने जागकर बिताई थीं? क्या कोई प्रशासन उस मानसिक यातना का मूल्य समझ सकता है, जिसमें एक युवा स्वयं को असफल नहीं, बल्कि ठगा हुआ महसूस करता है?
यह भी एक कटु सत्य है कि परीक्षा केंद्रों पर विद्यार्थियों के साथ होने वाला व्यवहार कई बार उन्हें अपराधी जैसा अनुभव कराता है। कठोर जाँच, अपमानजनक भाषा, अव्यवस्थित केंद्र, दूर-दराज़ से आने वाले विद्यार्थियों के लिए सामान रखने की व्यवस्था का अभाव, अभिभावकों के बैठने तक की सुविधा न होना । क्या यही वह नया भारत है, जिसके सपनों का प्रचार हर मंच से किया जाता है?सच तो यह है कि यह सब उस संवेदनहीन प्रशासनिक संस्कृति की ओर संकेत करता है, जिसमें विद्यार्थी “मानव” नहीं, केवल “रोल नंबर” बनकर रह गया है। विडंबना यह है कि जिस युवा पीढ़ी को राष्ट्र का भविष्य कहा जाता है, वही व्यवस्था के सबसे अधिक असुरक्षित और उपेक्षित वर्ग में बदलता जा रहा है।
महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि क्या सारे वादे सत्ता और उसके अधिकार पाने तक ही सीमित है। जिस तरह 2026 की नीट परीक्षा निरस्त हुई है उसमें पूरे देश का विद्यार्थी शामिल हुआ था ,उस एक - एक विद्यार्थी के प्रति सारे कोचिंग संस्थानों की, आम नागरिक की , विद्यालयों की,नेताओं की सबकी महती जिम्मेदारी है कि वे अपने ही इन बच्चों के साथ खड़े हो। अपराधियों को ऐसी सजा दी जाए कि आने वाले समय में कोई भी परिक्षा रद्द न हो।
भारत में प्रतियोगी परीक्षाएँ केवल चयन की प्रक्रिया नहीं हैं; वे करोड़ों परिवारों के सपनों, संघर्षों और सामाजिक आकांक्षाओं की धुरी हैं। विशेषतः चिकित्सा शिक्षा हेतु आयोजित नीट जैसी परीक्षा तो अनेक विद्यार्थियों के लिए जीवन-दृष्टि और भविष्य-निर्माण का आधार बन चुकी है। ऐसे में यदि परीक्षा निरस्त होती है, परिणामों पर रोक लगती है अथवा प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाएँ सामने आती हैं, तो यह केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं रह जाती; यह राष्ट्र की युवा चेतना पर कुठाराघात है।
सच तो यह है कि यह केवल परीक्षा प्रणाली का संकट नहीं, बल्कि शासन की नैतिक विश्वसनीयता का संकट है। क्योंकि जब ईमानदार परिश्रम करने वाला युवा बार-बार हारता है और अपराधी नेटवर्क व्यवस्था को नियंत्रित करते दिखाई देते हैं, तब लोकतंत्र के भीतर निराशा का अंधकार जन्म लेने लगता है।
यह स्थिति किसी आतंकवादी घटना से कम भयावह नहीं। आतंकवाद शरीरों को मारता है, पर ऐसी भ्रष्ट व्यवस्थाएँ युवाओं के आत्मविश्वास, आशाओं और भविष्य को मारती हैं। एक आतंकवादी हमला कुछ क्षणों का भय पैदा करता है, किंतु परीक्षा घोटाले वर्षों तक केवल एक पीढ़ी नहीं अनेक पीढ़ियों के भीतर अविश्वास और क्रोध का जहर भर देते हैं।
- डॉ हंसा कमलेश नर्मदापुरम
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