काव्य :
कौन देखे देश की हालत यहां अब
धर्म का झंडा उछाला जा रहा है राम को उर में बिठाला जा रहा है।
किन्तु निसदिन रेप कर के मौमिता का, मार कर के शव निकाला जा रहा है।
धर्म के बस नाम पर खुदवा अखाड़े, रंक का छीना निवाला जा रहा है।
लूटते हैं रोज हाकिम सँग लुटेरे, प्लान कर सबको खँगाला जा रहा है।
खास हैं जो लोग हाकिम के यहां पर, सिर्फ उनका ही हवाला जा रहा है।
कौन देखे देश की हालत यहां अब,निज सुखों को बस सँभाला जा रहा है।
क्या करे दीपक भला निस्तेज होकर, ज्योति का छीना उजाला जा रहा है।
--रजनीश मिश्र 'दीपक' खुटार शाहजहांपुर उप्र
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