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काव्य : भगवद् गीता - नवाँ अध्याय -रानी पांडेय , रायगढ़ छत्तीसगढ


 काव्य : 

भगवद् गीता - नवाँ अध्याय 


"ज्ञान से श्रद्धा की उत्पति होती है "

कृष्ण अर्जुन को अपने एश्वर्य का 

ज्ञान देते कहते है-वही कर्ता, वही

 कारक, वही स्वामी, वही भोक्ता ,

वो प्रकृति में, परंतु प्रकृति से परे,

सामान्य व्यक्ति की समझ के परे,

हे अर्जुन, कुछ समझो ना समझो 

बस मेरी भक्ति से दृढ़ता से जुड़े रहो, 

महात्मा मेरी भक्ति की शरण में रहते ,

मेरी अंतरंग शक्ति मे रहते, सभी देवी 

देवता मेरे भक्तों पर कृपा करते, 

जैसे अर्जुन सभी देवीय शस्त्रों से 

 सुसज्जित, मैं अपनी प्रतिज्ञा तोड़  

 सकता ,लेकिन भक्तों की नहीं ,

अतः हे कौन्तेय, तुम ये घोषणा करो 

कृष्ण भक्तों का कभी सर्वनाश नहीं होता।

एकत्वेन,पृथकत्वेन,विश्वतोमुखम्

ये तीन धारणाएँ है-

हम सब मे भगवान,देवता-भगवान 

 एक समान, ईश्वर एक है-सर्वश्रेष्ठ है।

इन्द्र-सूर्य(विवस्वान),देवता 

पुण्यात्माओं की उपाधि है,

कृष्ण ईश्वर है, उपाधि नही।

कौरवों पाण्डवों के पूर्वज भी 

इन्द्र की उपाधि से सम्मानित, 

मोक्ष का वरदान सिर्फ विष्णु देते 

शिव, ब्रम्हा भी नहीं। 

जो,देवता, पितर ,राक्षस, भूत-प्रेत 

की पूजा करते, जाते उनके धाम ,

श्रद्धा विहीन व्यक्ति पुनर्जन्म के 

चक्र में जर,व्याधि,जन्म मृत्यु सहता 

विष्णुधाम वहीं जाते जो करते 

हरे  हरे कृष्णा, हरे हरे राम  ।

कृष्ण स्वीकारते भक्ति भाव से 

पत्ते, पुष्प, पानी,फल इतना सरल,

अगर भक्ति भी नहीं, तो कर्मयोग 

से संवार ले मानव अपना जीवन तल।

आहार- विहार, दान -पुण्य सब 

अर्पण कृष्ण को,राम को,

जीवन के उद्धेश्य से जुड़े जो, 

नकारात्मक ऊर्जा से परे वो,

ऐसी संगति सुधारे सबकी गति।

 हरे  हरे कृष्ण, हरे हरे राम ।

भक्त, भक्ति, भगवान का सबंध,

जैसे कृष्ण, सारथी, अर्जुन का संगम।


 - रानी पांडेय , रायगढ़ छत्तीसगढ ।

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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