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काव्य : पूर्णिमा का चांद - देवेन्द्र थापक गुलमोहर भोपाल


 काव्य : 

पूर्णिमा का चांद 


नीले अम्बर पर हंसता है,

यह पूर्णिमा का चाॅद 

बिखेर देता है,धवल चांदनी

जैसे हुई ना सांझ ।।

भ्रमित हो रही है,कुमुदिनी

यह सूरज है,या चंन्दा 

क्या यूं ही,कली बनी रहूंगी 

इससे है वह शर्मिंदा ।।

चकवा भी,यह ना समझ पाया

कब रात कटी,कब दिन  आया

रात चल रही है अभी,या

दिन का सूरज निकल आया ।।

सितारों से जड़ी ,ओढ़े चादर

लगता मणि- रत्नों से घिरा चांद 

नभ में फैलाये शीतलता

कुंदन सा दमकता ,प्यारा चांद। ।


नीले अंबर पर हंसता है

यह पूर्णिमा का चांद ।।

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 - देवेन्द्र थापक गुलमोहर भोपाल 

9827255300 मोबाइल नंबर

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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