काव्य :
सच्ची दिवाली
ये जो नन्हे दीप जले हैं, , शिशु से मुस्कराते हैं
अंधकार में लड़े निरंतर , निज बल से जग जाते हैं
जद्दोजहद भरी जिंदगी, हम सबकी अक्सर होती
दिवाली पे दीप जले तो मिले ज्ञान का है मोती ।
सूरज का वंशज है दीपक, आकर हमको कहता है
सत्य भले हो कितना छोटा , सदा अडिग ही रहता है
एक पतली - सी किरण भला जब , अंधकार से लड़ती हो
सितारे की बुझी रोशनी , उजाला देने कहती हो।
साहस की शम्मा जला के तू भी आगे बढ़ता जा
बाधाओं का खड़ा हिमालय तू भी ऊपर चढ़ता जा
जीवन की मावस में फिर से दीप्त दिवाली आएगी
बुझे हुए नयनों में नूतन ,ज्योति जगती जाएगी।
दिवाली का अर्थ यही है, बाधा तम में उजियारा
प्रकाशित होगा तेरा बस, कर्मों से भाग्य तारा
अपने विवेक की सीता को तुम मुक्त करो बुराई से
तभी मिलोगे तुम जाकर , उस पुण्य की रघुराई से।
सारा जग इक लंकपुरी है , घट घट रावण चीख रहा
कहां गया अब राम यहां, गली गली रावण दीख रहा
चीख रहा है असुर आज, हिंसा और लड़ाई का
कैसे हो उद्धार यहां पे, पग पग जानकी माई का।
सदाचार का दीप जलाओ, तभी मिटेगा अंधियारा
प्रेम का डालो घी उसमें फिर, मन में होगा उजियारा
चारों तरफ प्रकाश रहेगा, और हटे मन का जाला
स्वच्छ बनेगा जीवन सारा, तम को हर लेगी ज्वाला।
दीप जलाओ द्वार पर अपने, जो सैनिक है शहीद हुआ
दीप जलाओ पूर्वज हेतु ,जिनसे यह जीवन मिला
दीप जलाओ तुम हृदय में , अच्छी तभी दिवाली होगी
मानवता का दीपक जले तो सच्ची तभी दिवाली होगी।
- डॉक्टर चंद्रदत्त शर्मा रोहतक

