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परिचर्चा : विकराल होता ध्वनि प्रदूषण : कैसे लगे रोक ? प्रस्तुति - अर्चना पण्डया,दिल्ली


 परिचर्चा : 

विकराल होता ध्वनि प्रदूषण : कैसे लगे रोक ?

प्रस्तुति - अर्चना पण्डया,दिल्ली

आजकल त्यौहारों  की धूम चल रही है.......गणपति, नवरात्रि ,दशहरा  अभी दीवाली मेला आने वाला है।.जैसे त्योहार जिन में सामूहिक रूप से नृत्य आदि होता है और लाउडस्पीकर पर डीजे की आवाज से कभी भक्ति गीत कभी फिल्मी गीत बजाए जाते हैं ।यह आवाज मनुष्य के लिए कितनी खतरनाक हो सकती है इसका उदाहरण है। वह बच्चा जो गणपति विसर्जन के समय  डीजे की आवाज से बेहोश हो गया और उसकी मां  मदद के लिए पुकार करती रही लेकिन किसी तक वह पुकार नहीं पहुंची। और बच्चे की मृत्यु हो गई ।आवाज जिसके बिना दुनिया सूनी है।

आवाज जो मनुष्य के लिए पशु पक्षियों के लिए खतरनाक भी हो सकती है ।

ध्वनि प्रदूषण ने विकराल रूप धारण कर लिया है , कैसे लगे रोक?

   इस विषय की गंभीरता को लेकर दिल्ली विश्व मैत्री मंच की लेखिकाओं ने अपने विचार रखे और इसकी रोकथाम के लिए सुझाव भी दिये.......

गुरुग्राम की साहित्यकार सविता स्याल  ने कहा- ध्वनि प्रदूषण निश्चय ही हम सबके लिये ख़तरनाक है । ब्याह शादियों में अनेक बार कनफोडू डी०जे० बजाया जाता है जो कानों के बहरेपन का कारण ही नही, उच्च रक्तचाप एवं ह्दय शूल का कारण भी बन सकता है । इतनी ऊंची आवाज से आसपास वालों के लिये भी परेशानी बन जाता है ।

सरकार को ऊंची आवाज में डी०जे० एवं लाऊड स्पीकर बजाने वालों के विरुद्ध कार्रवाई करनी चाहिए तथा जुर्माना लगाना चाहिए।

दिल्ली की राधा गोयल  ने अपनी बात कुछ यूं रखी-     यह बात सरासर गलत है कि ध्वनि विस्तारक यंत्र ही भक्ति के द्योतक हैं। *जो मन से की जाती है, वही भक्ति कहलाती है।* जो दिखावे के लिए की जाती है, वह भक्ति नहीं, अपितु केवल दिखावा होता है। हम देखते हैं कि कीर्तन के नाम पर जोर शोर से लाउडस्पीकर पर भजन गाए जाते हैं। आवाज भी बहुत ऊँची होती हैं। जोरों से तालियाँ बज रही होती हैं।महिलाएँ और पुरुष झूम- झूम कर नाचते हैं।न जाने कितने ही चैनलों पर भी भक्ति प्रदर्शन होता है।लाईव टेलीकास्ट होने के कारण लोग जरा ज्यादा ही नाचते हैं ताकि उनके परिजन उनको देख सकें।

      शुक्र है कि सरकार ने दस बजे के बाद लाऊडस्पीकर पर रोक लगा दी है वरना तो पहले सारी- सारी रात जागरण होते थे।खूब ऊँची आवाज़ में भजन गाए जाते थे।जिन दिनों बच्चों की परीक्षाएँ होती थीं तो बच्चे न तो पढ़ पाते थे और न ही सो पाते थे। घर के बड़े बुजुर्गों का तो बहुत ही बुरा हाल हो जाता था।

      प्राचीन काल में भी लोग भक्ति करते थे। ईश्वर की आराधना करते थे और सही मायने में देखा जाए तो एक तरह से उनकी प्रार्थना टेलीपैथी का काम करती थी। आजकल जो बात हम टेलीफोन द्वारा करते हैं,पहले के ऋषि मुनि वह सब मानसिक रूप से करते थे।

     सबसे अच्छी तो मानसिक पूजा है जिससे मन को शान्ति मिलती है और तन स्वस्थ रहता है। आजकल पूजा केवल दिखावा बनकर रह गई है। 

गुरूग्राम की रानी श्रीवास्तव  ने सुझाव दिया कि - इसके लिए कड़े कानून बने और भरपूर आर्थिक हर्जाना सरकार द्वारा वसूला जाये ।

गाजियाबाद की रहने वाली वंदना रानी दयाल  का कहना है कि -आजकल फिल्मी धुनों पर बने बेकार से भजनों को लाउड स्पीकर द्वारा विस्तारित करके  सबसे जबरदस्ती भक्ति कराई जाती है।बीमार लोग और बीमार हो जाते हैं पर यहां इंसानियत की किसे पड़ी है।सबको ईश्वर को ये सबूत देने की होड़ लगी रहती है कि मैने ज्यादा गाया या नाचा।मैने ज्यादा भक्ति की।कोई ये समझना ही नहीं चाहता कि प्रार्थना मन से मन के जुड़ाव को कहते हैं।बिना हो हल्ला और शोर शराबा के भी आराधना या पूजा की जा सकती है। मुझे तो लगता है त्यौहार आजकल मनोरंजन का अवसर हो गए हैं।

 डा० दुर्गा सिन्हा "उदार  का कहना है- एक निश्चित समय मर्यादा में और मर्यादित तीव्रता के साथ ही होना चाहिए । अपने अधिकार का दुरूपयोग दूसरों के अधिकार के हनन के लिए न करें तो बेहतर हो ।

 बाला जी का कहना है कि - हम सब घर परिवार ओर रिश्तों में जी़रो टोलरेंस रखते हैं,जब की समाज में व्याप्त दूषणों को लेकर हम सहनशील ओर उदार हो जाते हैं,इसके मुख्य कारण हैं हमारा आलस ओर लेट गो करने वाला स्वभाव ओर इन सबसे उपर सरकारी तंत्र के प्रति हमारा कमजोर विश्वास।अगर तंत्र से काम करवाना आसान हो जाये , तो शायद कुछ बेहतरी आ सकती है। फिर वही  तंत्र को भी तो हमें ही ठीक करना है।

 वरिष्ठ लेखिका सरोज गुप्ता  का कहना है- सरकार ने लाउडस्पीकर और वाद्य यंत्रों के प्रयोग का समय रात्रि 11:00 बजे निर्धारित किया हुआ है लेकिन लोग कहां मानते हैं , इसके लिए कड़े नियम बनाने चाहिए और ऐसे लोगों पर पर्याप्त जुर्माना लगाना चाहिए हमारे देश के कानून इतने ढीले हैं कि लोग उनका उल्लंघन मजे से करते हैं ।

वरिष्ठ साहित्यकार पुष्पा शर्मा  ने बिल्कुल सही कहा कि- हमारे ऋषि मुनि स्वयं ही सस्वर मत्रोच्चारण करते थे। गायन भी बिना ध्वनि प्रसारक यन्त्रों के होता था। ध्वनि मर्यादित रहे। आवश्यक है।

डा० अंजना गर्ग  का कथन बिल्कुल उचित है कि हो हल्ला और शोर शराब ही पूजा बन गया है। त्योहार मनोरंजन का नहीं पूरी तरह दिखावे का रूप ले चुके हैं।

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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