काव्य :
नवगीत
'तामस की कारा'
खपी पीढ़ियाँ सपनों में ही, हुआ न उजियारा।
कब तक हो भिनसारा भाई, कब तक भिनसारा।।
तेल चुका ढिबरी का सारा, बाती राख हुई।
आसमान तक अँधियारे की, हँसमुख साख हुई।।
सधन हुई है दिन-प्रतिदिन ही, तामस की कारा।।
नकबज़नी में रोटी के, नख, घिस-घिस टूट गए।
पुस्तक का घर मावस के कुछ, गुंडे लूट गए।।
चौराहों पर बेकारी का, चीख रहा नारा।।
श्वास-श्वास पर पूरब के हैं, प्रतिबंधित पहरे।
जब-जब सोचे निकले बाहर, पाँव धसे गहरे।।
खर्च हो गया भूख-प्यास पर, दम-खम था सारा।।
स्वर्ण-श्रंखला में बँध घंटे, भूल गए बजना।
आठ पहर विरुदावलियाँ ही, उनको जो भजना।।
रुद्ध हुई गंगा यमुना की, समरस जलधारा।।
लूट गए सब शातिर छल से, अवसर हाथों के।
काटे चुन-चुन हार गए हम, 'जीवन' पाथों के।।
बदले हर मौसम ने बाँटा, सिक्त श्वेद खारा।।
- भीमराव 'जीवन' बैतूल
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