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छात्र आंदोलन की सफलता: शुरुआत या संपूर्ण समाधान? - मिलन चौबे, शिक्षाविद , जबलपुर



छात्र आंदोलन की सफलता: शुरुआत या संपूर्ण समाधान?

लोकतंत्र में छात्र शक्ति की ऐतिहासिक जीत
  
     भारतीय लोकतंत्र में बहुत कम बार ऐसा हुआ है कि जन-आंदोलन के सीधे दबाव में सरकार को इतना बड़ा राजनीतिक निर्णय लेना पड़ा हो।  
NEET जैसी राष्ट्रीय परीक्षा में पेपर लीक और धांधली के आरोपों के बाद जंतर-मंतर पर 1 महीने से अधिक समय तक चले शांतिपूर्ण छात्र आंदोलन के परिणामस्वरूप शिक्षा मंत्री को त्यागपत्र देना पड़ा।  
यह केवल एक पद का इस्तीफा नहीं है। यह प्रमाण है कि जब युवा संवैधानिक और अहिंसक तरीके से एकजुट होता है, तो जवाबदेही तय होती है। इस आंदोलन ने सिद्ध किया कि लोकतंत्र में "छात्र हित" सर्वोपरि है।

*• पारदर्शी परीक्षा प्रणाली की नई उम्मीद*  
किसी भी बड़े आंदोलन में कुछ राजनीतिक और अनर्गल तत्व आ ही जाते हैं। लेकिन इस आंदोलन का मूल उद्देश्य स्पष्ट था - _"पारदर्शी, निष्पक्ष और भ्रष्टाचार-मुक्त परीक्षा प्रणाली"_।  
शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद सरकार ने CBT मोड को मजबूत करने और परीक्षा सुरक्षा बढ़ाने की घोषणा की है। इस जीत ने देशभर के छात्रों में यह विश्वास जगाया है कि अब लाखों बच्चों की मेहनत को पेपर-लीक माफिया नीलाम नहीं कर पाएगा।

*• योग्यता, मानसिक दबाव और सामान्य वर्ग की अनदेखी*  
यह आंदोलन का सबसे संवेदनशील पक्ष है, जिसे अक्सर नजरअंदाज किया जाता है।  

  *- अवसाद और आत्महत्या का संकट*  
  बार-बार पेपर रद्द होना, परिणाम लटकना और भ्रष्टाचार के कारण कई होनहार छात्रों ने अवसाद में आकर आत्मघाती कदम उठाए हैं। एक छात्र के लिए उसकी "योग्यता" ही सबसे बड़ा हथियार है। जब व्यवस्था उसे भी छीन लेती है, तो निराशा गहरी हो जाती है।

  *- सामान्य वर्ग की दोहरी मार*  
  इस व्यवस्थागत विसंगति का सबसे बड़ा शिकार सामान्य वर्ग का मध्यमवर्गीय छात्र है। जिसके पास न आरक्षण का सुरक्षा कवच है, न आर्थिक जुगाड़।  
  सीमित सीटें, ऊंची कट-ऑफ और बिना किसी रियायत के मेहनत करने वाले इन छात्रों के लिए "एक-एक अंक" जीवन-मरण का सवाल बन जाता है। पेपर लीक का पहला और सबसे गहरा आघात इन्हीं की उम्मीदों पर लगता है।

*• आरक्षण और सीटों पर व्यापक विमर्श जरूरी*  
आंदोलन ने फोकस न भटके इसलिए आरक्षण जैसे मुद्दे को जानबूझकर अलग रखा। लेकिन अब समय आ गया है कि परीक्षा प्रणाली में "सीटों के समीकरण" और "आरक्षण नीतियों" पर खुली और संवेदनशील बहस हो।  
आगे की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जहां:
- _सामाजिक न्याय_ के साथ _शुद्ध मेरिट_ का भी सम्मान हो
- _सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर_ छात्रों को भी भरोसा मिले कि व्यवस्था उनके संघर्ष देख रही है  
- _मानसिक स्वास्थ्य काउंसलिंग_ अनिवार्य हो, ताकि कोई छात्र तनाव में आत्महत्या जैसा कदम न उठाए

*• निष्कर्ष: यह अंत नहीं, शुरुआत है*  
शिक्षा मंत्री का इस्तीफा छात्रों की ऐतिहासिक जीत है। इसने व्यवस्था को संदेश दिया है कि युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ अब नहीं चलेगा।  
लेकिन संपूर्ण सफलता तब होगी जब:  
परीक्षा तंत्र 100% अभेद्य बनेगा, भ्रष्टाचार का समूल नाश होगा, और देश का हर छात्र - चाहे आरक्षित वर्ग से हो या सामान्य वर्ग से - यह विश्वास कर सकेगा कि उसकी मेहनत के साथ इस देश में अन्याय नहीं होगा।

- मिलन चौबे, शिक्षाविद , जबलपुर
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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