दीपावली क्यों मनाते है ?:
*श्री महालक्ष्मी जन्मोत्सव के रूप में *:-
इस सृष्टि में बिना कारण कोई कार्य नहीं होता । जिज्ञासु मन हर कारण के मूल तक पहुंचना चाहता है तभी उसे बोध होता है ।बोध होने पर ही उसके पीछे छिपे वैज्ञानिक रहस्यों की परतें खोल पाता है अन्यथा केवल रीति रिवाज परम्पराओं के पीछे भागने का क्या अर्थ। दीपावली मनाने के लिये सर्वप्रथम पौराणिक कथाओं में आज के दिन समुद्र मंथन से महालक्ष्मी का प्रादुर्भाव होता है। जिसको पाने के लिये समुद्र मंथन की भूमिका श्री हरि द्वारा रची गई थी ।
दुर्वासा ऋषि को देवराज इन्द्र को दिये गये श्राप के कारण स्वर्ग का सारा वैभव समाप्त होकर समुद्र में समा गया था । स्वर्ग पर दैत्यराज प्रहलाद के पुत्र विरोचन का अधिकार होजाने से वह इधर उधर भटक रहे थे । ऐसे में वह सभी श्रीहरि की शरण में गये तब विष्णु रूपी श्री हरि ने उन्हें विरोचन से मिलकर समुद्र मंथन के लिये कहा ।जिसके मंथन से अमृत निकलता और उसे पीकर देवता अमर हो जायेंगे । दैत्यों के पास महादेव की कृपा से प्राप्त शुक्राचार्य को मृतसंजीवनी विद्या थी जिसके कारण वह अजेय थे ।इसीलिये युद्ध में देवता सदैव ही उनसे हार जाते । इस तरह देवताओं के अमर हो जाने से उनकी मृत्यु नहीं होगी ।
जलनिधि समुद्रदेव के अंतसमें ही सारी निधियां छिपीं थी ।सब कुछ मंथन के समयदेने के बाद भी समुद्रदेव अपनी पुत्री महालक्ष्मी को नही देना चाहते थे। वह उनकी अटूट सम्पत्ति की स्वामिनी थी। अमृत कलश के पश्चात भी जब मंथन जारी रहा तो चतुर्दशी को शक्ति महाकाली का जन्म हुआ इसके बाद भी मंथन होने पर अंत मे समुद्र देव को अपनी सबसे प्रिय पुत्री धन ऐश्वर्य वैभव की स्वामिनी महालक्ष्मी को न चाहते हुये भी संपूर्ण संसार के कल्याण के लिये देना ही पड़ा। समुद्र से निकल कर लक्ष्मी जी ने अंत में पति के रूप में श्रीहरि विष्णु का वरण किया ।
एक कथा के अनुसार महिषा सुर के वध के पश्चात भी जब देवी महाकाली का रौद्र रूप शांत नहीं हुआ और वह उन्मत् हो नर्त्तन करती संहार कर रहीं थी तब देवताओं की प्रार्थना पर स्वयं महाकाली के क्रोध को शांत करने के लिये ही रौद्रावतार महाकाल शिव जी को उनके पथ को अवरुद्ध करते हुये मार्ग में लेटना पड़ा ।जब महाकाली वहां से निकली तो उनका पैर अचानक शिव जी के सीने पर पड़े उससे पहले ही । शिव जी के मुख से राम-राम कहते ही महाकाली ने अपने पति के स्वर को पहचान लिया और उनका क्रोध शांत हुआ । इस कथा के पीते छिपा रहस्य मनोवैज्ञानिक तथ्य नारी के क्रोध को कोई और नहीं बल्कि उसका पति ही अपनी प्रेम पूर्ण वाणी से शांत कर सकता है । विष के उपचार की दवा भी विष ही है पर उसके देने का तरीका अलग।
इसी प्रकार से जब जलप्रलय के पश्चात संपूर्ण संसार की सम्पत्ति जलमग्न हो जाये तो उसे पुन:पाने के लिये सभी का सामूहिक प्रयास एवं सहयोग आवश्यक है तभी वह उस सम्पत्ति को समुद्र से पा सकता है ।इन दोनों ही पौराणिक कहानियों के पीछे छिपे रहस्य को समझना होगा तभी हम उन्हें समझ पायेंगे ।
त्रेतायुग में दशहरे के दिन रावण वध और लंका पर विजय के पश्चात जब 14वर्ष का वनवास पूर्ण कर श्रीराम लक्ष्मण एवं सीताजी सहित अयोध्या आये तो उनके आगमन के पश्चात आज के दिन ही उनका राज्याभिषेक होने से सभी ने घी के दीप जलाकर हर्षोल्लास मनाते हुये उनका स्वागत किया । इसलिये यह त्यौहार अमावस के अंधकार को दूर कर प्रकाश पर्व के रूप में मनाया जाताहै ।
द्वापर युग में आज के दिन नरकासुर का सत्यभामा के सहयोग से वध करने के पश्चात उनके द्वारिकापुरी लौटने की खुशी में सभी ने घी के दीप जला कर उनका स्वागत किया ।
यदि हम प्रकृति की बात करें तो वर्षा ऋतु और चार मास चौमासे के पश्चात अवरुद्ध हुये मार्ग खुलने से यातायात संभव हुआ ।बरसात के कारण उत्पन।न हुई गंदगी सीलन नमी और दुर्गन्ध को दूर करते हुये स्वच्छता एवं सफाई के पश्चात ही खुशियां आती हैं उस खुशी को अमावस की काली अंधियारी रात में भी मिट्टी के दिये को तेल और बाती से संयुक्त कर अग्नि के माध्यम से जलाते हुये हम प्रकृति के सभी तत्वों के प्रति अपना आभार प्रकट करते हैं ।
जीवन में कितनी भी निराशा का अंधकार हो पर प्रकाश की एक किरण जलता हुआ दीप भीआशा की उमंग को तरंगित करता है । आईये आज हम भी तो अपने पथ को प्रशस्त करने के लिये अज्ञान के अंधकार को दूर करने के लिये आत्म ज्ञान के दीप को अपने अंतस् में प्रज्वलित करते हुये दीपोत्सव मनायें । धन्यवाद ।
- उषा सक्सेना -मुंबई

