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विदेशों में दीपावली - मधूलिका श्रीवास्तव ,भोपाल


 विदेशों में दीपावली

दीपावली को त्योहारों का त्योहार कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी । यह  एक एसा त्योहार है जिसे भारत का हर धर्मावलंबी बिना भेदभाव के मनाता है । कोई परिवार इसके आनंद से वंचित नहीं रहता । एक झोपड़ी में रहने वाला भी एक दिया तो रखता ही है,तो कोई दीप मालाओं से अपना घर सजा कर प्रसन्न होता है । झोपड़ी और बंगलों का प्रकाश तौला नहीं जा सकता । सबका अपना अलग आनंद  होता है ।

       दीवाली हमारे देश में तो बहुत धूमधाम से मनाई ही जाती है , विदेशों में भी यह पर्व विभिन्न स्वरूपों में मनाया जाता है । इस अवसर पर वे भी आतिशबाज़ी करते हैं ,रोशनी करते हैं ।

       सोवियत संघ में यह त्योहार नवंबर में मनाया जाता है  उस दिन जगह जगह रोशनी की जाती है तथा सत्ता के सर्वोच्च केंद्र क्रैमलिन महल में शानदार सजावट होती है । इसी दिन क्रैमलिन चौक पर सेना की परेड होती  है तथा रात में आतिशबाज़ी होती है ।

       स्वीडन में इसे  “लूसिया” के नाम से जाना जाता है ख़ूब रोशनी की जाती है । हर शहर में सर्वश्रेष्ठ सुंदरी का चयन किया जाता है उसे “ लूसिया सुंदरी “ कहते हैं, उसके मुकुट पर मोमबत्ती लगाकर पूरे शहर का चक्कर लगाते हुए मुख्य चौराहे पर सब लोग इकट्ठा होकर आतिशबाज़ी करते हैं ।

       थाईलैंड में पाँच नवंबर को दीवाली से मिलता जुलता त्योहार “कोचोंग” मनाया जाता है ।इस अवसर पर लोग केले के पत्तों से छोटी नाव बनाते हैं फिर उसमें जलता हुआ दिया और एक सिक्का रखकर नदी में प्रवाहित करते हैं फिर आतिशबाज़ी करते हैं। उनका मानना है कि इस तरह सारे पाप नदी में बह जाते हैं ।

       चीन में दीवाली “नई महुआ” के नाम से जानी जाती है ,चीनी व्यापारी इस दिन अपने बहीखाते बदलते हैं । दिन में विभिन्न देवी देवताओं की सवारियाँ निकाली जाती हैंऔर रात में रोशनी करते हैं ।

      नेपाल में तो यह पर्व भी भारत जैसे ही पाँच दिन तक मनाया जाता है ।

     भारत में दीवाली एक धार्मिक पर्व है । हिंदू  इस दिन भगवान राम की आराधना करते हैं और लक्ष्मी देवी का भी आवाहन करते हैं । दीवाली का समय ऋतु परिवर्तन का, धान पकने का तथा नई फ़सल आने का भी होता है । श्री राम के अयोध्या लौटने की ख़ुशी के साथ ही नई फ़सल कटने की ख़ुशी में भी यह त्योहार ज़ोर शोर से मनाया जाता है ।

         भारत और विभिन्न देशों में दीवाली के इस स्वरूप और भावना का यदि आध्यात्मिक कसौटी पर मूल्याँकन किया जाये तो एसा प्रतीत होता है कि इस सबके पीछे शायद कोई एक ही शक्ति है । सभी ने इसके मूल स्वरूप रोशनी व आतिशबाज़ी को तो ज़िंदा रखा मगर उत्सव के तरीक़ों को अपने अनुसार बदल लिया।

         दीपों की झिलमिल क़तारें

         ज़मीं पर जैसे उतरे सितारे

         खुदा भी है परेशान

     दो आसमां कब बनाये मैंने

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 - मधूलिका श्रीवास्तव ,भोपाल

9425007686

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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