कंजकें - लघुकथा
"सुषमा , तुम मंदिर जाने के लिए तैयार हो रही हो? मैं भी चलूंगी, नवरात्रों में मैं देवी माँ के दर्शन करने के लिए ज़रूर जाती हूँ।" अन्नू ने अपनी देवरानी सुषमा से पूछा।
" नही भाभी, मैं तो नर्सिंग होम जा रही हूं।" सुषमा ने सधा हुआ जवाब दिया।
"तुम्हे क्या हुआ? जो डॉक्टर के यहां सुबह सुबह जा रही हो।" अन्नू ने फिर सुषमा से सवाल किया।
"मैं नवरात्रों में रोज़ कुछ घंटे उन अल्ट्रासाउंड केंद्रों के बाहर बिताती हूँ जहाँ स्वास्थ्य जांच के नाम पर चोरी छिपे भ्रूण की जांच की जाती है। जो माँएं चेहरा लटकाये केंद्र से बाहर आती हैं, मैं उन्हें हौंसला देती हूँ। उनकी हर तरह से मदद करने की कोशिश करती हूँ। उन्हें एबॉर्शन करवाने से रोकती हूँ।"
सुषमा को बीच में टोकते हुए अन्नू ने कहा ," तुम इन अल्ट्रासाउंड केंद्रों की शिकायत पुलिस में क्यों नही करती?"
"भाभी मैं सज़ा दिलवाने की बजाए लोगों की सोच बदलना चाहती हूं। सज़ा एक को दिलवाओ तो कहीं दूसरा या तीसरा जांच केंद्र खुल जायेगा। लोगो में जागरूकता पैदा करके इसे रोकना ज़्यादा सही है। इसलिए मेरा उद्देश्य रहता है अष्टमी तक कम से कम माँ भगवती की सात कंजकों की जान बचाना। "
अन्नू के मुँह से बेसाख्ता निकला ' सच में सुषमा आज देश को माँ दुर्गा के तेरे जैसे भक्तों की ज़रूरत है।'
- डॉ अंजना गर्ग , म द वि रोहतक

