काव्य :
रिश्तों के परिंदे
रिश्तों के परिंदे
सब साथ छोड़ गये,
एक एक करके
सब हाथ छोड़ गये,
कारवां था साँसों का
खुश्बुओं से भरा
स्वार्थ की हवाओं से
उड़ता, बिखरता गया।
सफर अब जिंदगी का
एकांत हो गया,
आती-जाती लहरों-सा
वीराना हो गया,
चल रहे हैं कदम
के चलना चलन है
जमाने का,
चलती कहाँ है किसी
की खुदाई रीत
के आगे,
एक भी साँस मिलती
नहीं खुदाई लिखाई
के आगे।
- डा.नीलम ,अजमेर
Tags:
काव्य
.jpg)
