काव्य :
दीप से दीप जलाते चलो
प्रज्वलित अनन्त दिए आज हैं मंदिरों में
दें साथ,कुछ उजाले वंचितोंके आंगन में
नन्हा आया अव्वल, माँ ने हंसके वादा पूरा निभाया।
स्वयंके साथ पापा दादाजी से, आशीष दिलवाया।
जी भरके मिठाई पटाखों को ले आना उसे सुझाया।
दादी ने भी खोल दिया बटवा, उमंगों से प्रेम लुटाया।
सारे जगके मंदिरों, जले दिए,उसको भी लाने बताया ।
खरीदना सब उसे आज,पापाजी ने ये समझाया।
दीवाली बाजार में सजीं दुकानों रौनक, चकित हुआ।
मनभर के खरीदारी करने को उद्धत वो हुआ।
चीनी ,विदेशी खिलौनों,झड़ियों, पटाखों की सजीं।
मन में उसके भी असीम मधुर खलबली सी मची।
क्या लूं कैसे समेटूं आज तो सब उसके हाथ है।
जज्बातों को पूरे करने का भी आशीर्वाद साथ है।
बढ़ा आगे,
लिए बैठी दिए, बूढ़ी अम्माजी ने आस से निहारा।
बढ़ा उधर ही धीमे से, पापा ने भी उसे स्वीकारा।
लाना बहुत दिए हम भी,घर ऊपर तक सजाएंगे।
याद आये आदेश वे दादी-दादाजी,मां ने जो दिए।
सारे दीपक खरीद, उससे भी आशीष बटोर लिए।
क्रेकर्स नहीं,बस कुछ फुलझड़ियां ही मैं लूंगा।
पसंद-मिठाई भी घर की ही आज खूब खाऊंगा।
राहमिला तभी वोबच्चा, उदास भोला मन का सच्चा।
जाने मनमें क्या आया,थैले में से कुछ उसको दिया।
खुश होकर पिता को देख धीमे से तब मुस्कुराया।
देख दृश्य गंदे से कपड़े में, छोटी बच्ची
दौड़ आई।
सुदृढ़हो, कुछ दिए,लाई बताशे ,फूलों की थैली पकड़ाई।
चकित पिता प्रसन्नतासे निहारें,ये समझ कैसे आई।
निवास पँहुच, राधाबाई, मोहन भैया, अंकित को बुलवाया।
खुशी से लाया सामान, समान सबको बंटवाया।
पापा दादी के शुभाशीष ,औ माँ को सब याद आया।
*मास्टरजी* के वचनों को, *बालक* उनका पूरा कर आया।
*दीप से दीप जलाना तुम* कितनों के घर हुए उज्ज्वल।
थोड़े दीप ,पुष्प, प्रसाद से परिपूर्ण, दादी का आँचल ।
- अलका मधुसूदन पटेल,जबलपुर मप्र

