.यम द्वितीया पर विशेष चिंतन:-
स्त्री पुरुष संबंधों की पराकाष्ठा पर एक यक्ष प्रश्न ?सूर्य की संज्ञा से संतान मनु यम और सूर्य पुत्री यमुना ।अपने भाई यम पर विमोहित होकर जब यमुना यम के पास प्रणय निवेदन लेकर विवाह के लिये कहने लगी कि "मैं आपसे विवाह करना चाहती हूं । आप मुझसे विवाह कर मुझे अपनी पत्नी बनायें "।तब चिंतन करते हुये यम ने कहा -"हे देवी! तुम मेरी भगिनी हो और जब हमारे भाई मनु को पिता ने धरा पर सृष्टि के विस्तार के लिये संसार में भेजा हो तो हमें भी उसका सहयोग करना है ।समाज को व्यवस्थित करने के लिये कुछ नियम भी बनाने होंगे ।
आओ ! पहली आहुति इस यज्ञ में हम अपने संबंधों के नियम की देंगे तभी तो समाज का सही ढंग से विस्तार हो पायेगा ।आज से स्त्री पुरुष संबंधों में नेह की धारा बहा कर हम एक ही माता -पिता की संतान होकर भाई -बहिन के पवित्र रिश्ते को सदा के लिये एक सूत्र में बांध दे" ।
भाई की बात पर अपनी सहमति प्रकट करती हुई यमुना अपने बड़े भाई मनु से मिलने के लिये सूर्य लोक से धरा पर नदी बन उतरने लगी तो यम ने यमुना का हाथ पकड़ते हुये कहा -यमी मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगा ।बहिन की रक्षा का बड़ा भाई होने के नाते तुम्हारी सुरक्षा का दायित्व भी तो मुझे निभाना है ।अपने पिता सूर्य देव का आशीर्वाद लेकर वह दोनों धरती पर उतर अपने भाई मनु से गले मिले ।
यम ने यमुना को आशीर्वाद देते हुये कहा -
"हे !यमुना आज के दिन जो कोई भी पुरुष अपनी बहिन के साथ तुम्हारे जल में स्नान करेगा और अपनी बहिन को उसकी सुरक्षा का वचन देकर उससे आशीर्वाद स्वरूप अपने माथे पर तिलक लगवायेगा उसे मेरे यम दूतों का भय नही सतायेगा यह मेरा तुम्हें वचन है" ।
यमुना ने अपने दोनों भाईयों के माथे पर तिलक लगा उन्हें आशीर्वाद दिया ।मनु ने अपनी बहिन यमुना का स्वागत करते हुये कहा -आप सम्मान पूर्वक इस धरा पर रह कर हमें सजल बनाईये ।अपने जुड़वा भाई यम को विदा करते हुये यमुना का मन दुखी हो रहा था ।मनु की ओर देखते हुये वह बोली-"मैं तभी तक हे भाई तुम्हारे साथ धरा पर रह़ूंगी जब तक तुम्हारी अपनी संस्कृति और सभ्यता का विस्तार मेरै तटों पर कर मुझे सम्मान देंगे ।उनके द्वारा प्रदूषित कये जाने पर मेरा रहना असंभव होगा । आज के दिन जो भाई अपनी बहिन केसाथ मेरे जल में स्नान करेगा मैं उसके तन के साथ ही मन को भी निर्मल कर उसे अपने भाई यम के दूतों से उसकी रक्षा करते हुये उसे चिरंजीवी होने का वरदान दूंगी" ।
यम द्वितीया को समर्पित भाई बहिन के रिश्ते की पहचान बतलाती यह कथा भाई दूज को ही समर्पित है
।यदि हम यमुना में भाई के साथ स्नान नही कर सकते तो कम से कम मन की कालिंदी धारा में गोता लगा कर इस पवित्र रिश्ते का सम्मान तो करें ।अपनी संस्कृति की रक्षा तो कर सकते हैं । धन्यवाद अपने उन सभी भाईयों को जो मन की पावन धारा में गोता लगा अपनी बहिनों को उनका सुरक्षा कवच बनकर रक्षा का वचन दें अन्यथा यमुना की धारा विली नहो जायेगी और तब रिश्तों का को नैतिक मूल्य नही रहेगा ।पुरुष की भोग की प्रवृति पर अंकुश लगाती यह कथा भाई बहिन के पवित्र रिश्तै पर आधारित है ।
- उषासक्सेना,मुंबई

