ad

लघुकथा : गर्म कपड़े - प्रो अंजना गर्ग, म द वि रोहतक


 

   लघुकथा : 

 गर्म कपड़े

' ओहो करण, इतनी शॉपिंग , कहां से कर लाए?' नेहा ने गेट खोलते ही जैसे ही अपने पति के हाथ में ढेरों लिफाफे देखें तो पूछा।

' कुछ नहीं यार गर्म कपड़ों की सेल इस बार जल्दी शुरू हो गई। बस देखा और खरीद लाया।फिर मेरे कई स्वेटर ढीले और शेपलेस से हो गए हैं।' करण ने सोफे पर लगभग फैलते हुए और सेंटर टेबल पर लिफाफे फैलाते हुए कहा।

 ' कर्ण माना आप के कुछ स्वेटर  पहनने लायक नहीं रहे पर अलमारी और बॉक्स में इन नये वालो को रखने की जगह बिल्कुल भी नहीं है।  मैं आपके  वह स्वेटर निकाल रही हूं जो आपने पिछली दो-तीन सर्दियों में एक बार भी नही पहने ताकि इन सब को रखने की जगह बन जाए।' नेहा ने कर्ण के आगे चाय का कप रखते हुए कहा।

' ठीक है तुम जो चाहे करो, पर मेरे यह सब वूलन मेरी कबर्ड में मुझे हैंगर्स में चाहिए।' कर्ण ने चाय का पहला सिप लेते हुए नेहा की तरफ देख कर कहा।

' ओ.के. जनाब यह कबर्ड में और वह तुम्हारे शेपलेस बाहर .....'

  नेहा की बात खत्म होने से पहले ही नेहा की सास गीता ने कहा,' नेहा जो निकालो वह सब कल ही रेलवे स्टेशन के पास बैठे गरीबों में बांट आना।'

' मम्मी पिछली बार जो मजदूरों की बस्ती में देकर आई थी। हफ्ते बाद मैं वहां से निकली तो देखा कितने गर्म कपड़े वही इधर-उधर पड़े थे उनकी ईंटो की झोपड़ियों में। शायद उनको इन गर्म कपड़ों की कोई कदर नही।' नेहा ने बड़ी नाराजगी से वाले अंदाज में कहा।

' तुम ठीक कह रही हो बेटा। वह इसलिए कि वह तुम अप्रैल के फर्स्ट वीक में देकर आई थी जब गर्म कपड़े पैक करते हुए तूने बेकार कपड़ों को दोबारा पैक करने की बजाय गरीबों को देना उचित समझा था। गीता ने नेहा को याद करवाने की कोशिश करते हुए कहा।

' पर मम्मी यह तो मैंने अच्छा ही किया था।'

' तूने बच्चे बिल्कुल अच्छा किया था पर ज्यादा अच्छा होता अगर इन्हें हम दिसंबर के शुरू में निकाल कर दे आते'

' क्या मतलब ....? नेहा ने थोड़ा हैरानी सी से प्रश्न किया।

' फिर वह उन सब को पहन पाते।दिसंबर जनवरी की ठंड मे वह गर्म कपड़े उन्हे ठंड से बचाने में मदद करते । जब तुम देकर आई तो उनका उस साइट पर काम खत्म हो गया होगा।फिर उन्हें अगली जगह या शहर मे जाना पड़ता है मजदूरी करने के लिए। वह अपनी गठरी में एक या दो जो ले जा सकते थे वह ले गए होंगे। बाकी उन्हीं झोपड़ियों में छोड़ गए। बेटा गरीब उतना ही रखता है जितनी उसको जरूरत होती है। हमारी तरह स्टोर करने की न तो उनकी आदत होती है न ही जगह।'गीता ने स्थिति को समझाने का प्रयास किया।

' हां मम्मी आप कह तो ठीक रही हो। हम गर्मी सर्दी के कपड़े किसी को देने के लिए अपनी सुविधा से निकालते है।यह देखकर नही कि इनकी उनको कब जरूरत है।' नेहा ने विचारते हुए से कहा।

' हां बेटा, एक बात और हम गर्म कपड़ों का दान करने के लिए लोहड़ी सक्रांत जैसे त्योहार का इंतजार करते रहते हैं जबकि कड़ाके की ठंड तो अब पड़ रही है। इसलिए कल जाते हुए जो सक्रांत में देना है वह भी लेती जाना' गीता ने कहा।

' मम्मी आपने यह सब मुझे पहले क्यों नहीं बताया।'

' बेटा हम बड़े लोग यह सोच कर चुप रह जाते हैं। कि बच्चे कहेंगे इतनी ठंड पड़ रही है। बाहर कदम रखने का मन नहीं करता और मम्मी को दान पुण्य की पड़ी है।' गीता ने प्यार से कहा।

 ' हां मम्मी आप ठीक कह रही हो। हम नौजवान बहुत मूडी और सेल्फ सेंटर्ड हो गए हैं।'

' कोई बात नहीं बेटा, जब जागो तब सवेरा।'

            -   प्रो अंजना गर्ग,  म द वि रोहतक

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

Post a Comment

Previous Post Next Post