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काव्य : सारथी - रानी पांडेय, रायगढ़,छत्तीसगढ


 काव्य : 

सारथी


तुम बन जाओ सारथी,

और मै बनूं  विद्यार्थी ,

हे ,कृष्ण तुम गुरू मेरे

और मैं तुम्हारी पारथी।

कण कण मे ढूँढने को,

पलछिन को बाँधने को

मै मुर्ख मै सुदामा सी,

गलियाँ जैसी मै काशी की,

भाप ना पायी माया,

थिरकती रही जर्जर काया,

वो डोर जो दिखती नही,

वो प्रीत प्रतीत होती नही,

पर साये से रहते हो,

हे यशोदानन्दन,कहो फिर 

अर्जुन से जो कहते हो।

तुम गीता के श्लोक मे ,

मंदिरो की घंटियो मे,

सर्वस्व सर्वदा रहते तो हो,

देखो क्या खींचा हुआ है,

जग अपनी मुट्ठी भींचा हुआ है,

न्याय- अन्याय की छिड़ी हुई है,

दोनो रथ पालकियां सजी हुई है,

भ्रमित यहाँ हम अर्जुन जैसे,

 ग्यान ही नही चक्रव्यूह का,

धराशायी सब अभिमन्यू जैसे,

हम ना जीना जानते ,ना मरना

हे सारथी !अब कैसे धरे धीर,

आओ हरो इस धरा की पीर।


रानी पांडेय, 

रायगढ़,छत्तीसगढ।

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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